मोदी सरकार का पहला बजट आने के करीब चार माह बाद ही केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने अगले वर्ष के बजट की तैयारी शुरू कर दी है। देश की कुछ अलग आर्थिक तस्वीर का खाका खींचने के उद्देश्य से बजट निर्माण में लगे अधिकारियों ने इस बार समय से कुछ पहले ही काम शुरू कर दिया है। अधिकारियों का कहना है कि अगले बजट में आम जनता के विकास से जुड़ी योजनाओं के लिए रकम की कोई तंगी नहीं होगी।
केंद्र सरकार के वित्त मंत्रालय में बजट विभाग से जुड़े अधिकारी यूं तो सालभर बजट के लिए कुछ न कुछ तैयारी करते ही रहते हैं, लेकिन अन्य विभागों के अधिकारी नवंबर के अंतिम सप्ताह या दिसंबर के प्रथम सप्ताह से बजट के लिए सक्रिय होते हैं। इस वर्ष अक्तूबर के अंतिम सप्ताह से ही इससे संबंधित तैयारी शुरू हो गई है। मंत्रालय के व्यय विभाग में सचिव आरपी वातल ने सभी विभागों के सचिवों से मिलना शुरू कर दिया है और निर्धारित समय के अंदर उन्हें परिव्यय का खाका भेजने को कहा है।
वित्त मंत्रालय के आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक सचिवों को संकेत दिया जा रहा है कि इस बार विकासात्मक कार्यों के लिए फंड की कोई कमी नहीं रहेगी। इसलिए आम जनता से जुड़ी योजनाओं को बजट में शामिल करने में कोताही नहीं बरतें। दरअसल, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में नरमी, डीजल की कीमत नियंत्रण मुक्त होने और खाद्य सुरक्षा कानून के लागू होने में देरी से अर्थव्यवस्था में सकारात्मक संकेत तो हैं ही, इससे सरकार की झोली में भी ज्यादा पैसे भी बच रहे हैं। इसलिए राजकोषीय स्थिति पर बोझ डाले बिना सरकार आगामी बजट में विकास कार्यों के लिए ज्यादा राशि उपलब्ध कराएगी।
रिसर्च फर्म इंडिया रेटिंग एंड रिसर्च की हाल ही में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक इंडियन बास्केट क्रूड के दाम 105 डॉलर प्रति बैरल से करीब 80 डॉलर प्रति बैरल तक घटने से इसी वर्ष सब्सिडी के मद में लगभग 15,000 करोड़ रुपये की बचत हो रही है। इसके अलावा अब डीजल पर कोई सब्सिडी नहीं देनी होगी। इसलिए विकास के अन्य कार्य करने के लिए सरकार के पास काफी रकम होगी।
डीजल सब्सिडी का सरकार पर कितना बोझ था, इसका अंदाजा इसी बात से हो जाता है कि कुल पेट्रोलियम सब्सिडी में इसकी हिस्सेदारी करीब 50 फीसदी बैठती थी। वर्ष 2013-14 में कुल पेट्रो सब्सिडी 1.39 लाख करोड़ रुपये थी, जिसमें से करीब 62,837 करोड़ रुपये डीजल पर सब्सिडी थी।
वर्ष 2012-13 में कुल पेट्रोलियम सब्सिडी 1.61 लाख करोड़ रुपये थी, जबकि डीजल सब्सिडी 92,061 करोड़ रुपये और 2011-12 कुल पेट्रोलियम सब्सिडी 1.38 लाख करोड़ रुपये में डीजल सब्सिडी की हिस्सेदारी 81,192 करोड़ रुपये की थी। अब सरकार डीजल पर एक पैसे की भी सब्सिडी नहीं देती है, इसलिए इस मद में सरकार पर कोई बोझ नहीं पड़ेगा।
इस साल खाद्य सुरक्षा कानून के लिए 1.15 लाख करोड़ रुपये निर्धारित किये गए थे, लेकिन अभी तक यह लागू नहीं हुआ है। इसके लागू होने में अभी और देरी है। अधिकारियों का कहना है कि इस मद में भी सरकार को 60,000-70,000 करोड़ रुपये बचेंगे। इसलिए राजकोषीय घाटे के भी बढ़ने की कोई चिंता नहीं है।