छोटे और मझोले कारोबारियों को बड़ी कंपनियों से मिलने वाले भुगतान में देरी को रोकने के लिए कई कंपनियां फैक्टरिंग सेवाएं दे रही हैं। इसके तहत कारोबारी को बड़ी कंपनी से मिलने वाले भुगतान की 80 फीसदी राशि तक फैक्टरिंग सेवाएं देने वाली कंपनियां भुगतान करती है। ऑर्डर भेजते वक्त ही भुगतान देने के एवज में 15-16 फीसदी तक ब्याज फैक्टरिंग सर्विसेज देने वाली कंपनियां लेती हैं।
इंडिया फैक्टरिंग के सीईओ सुदेब सर्बअधिकरी ने अमर उजाला को बताया कि छोटे और मझोले कारोबारी ज्यादातर बड़ी कंपनियों के लिए वेंडर का काम करते हैं। जिसके तहत उन्हें भुगतान 50-60 दिनों की अवधि में सामान्य तौर पर मिलता है। मौजूदा आर्थिक सुस्ती के दौर में यह अवधि काफी बढ़ गई है। ऐसे में भुगतान में देरी से छोटी कंपनियों के लिए वर्किंग कैपिटल की समस्या आ जाती है।
फैक्टरिंग सेवाएं देने वाली कंपनी इस समस्या को दूर करने के लिए छोटे कारोबारियों के साथ समझौता कर 80 फीसदी तक भुगतान की राशि को ऑर्डर बड़ी कंपनी के पास पहुंचने पर दे देती है। जबकि शेष राशि कंपनी के भुगतान के बाद कारोबारी को मिल जाती है। शुरू में ही भुगतान मिलने के एवज में छोटे कारोबारी को ब्याज चुकाना पड़ता है। इसके लिए छोटे कारोबारी, फैक्टरिंग सेवाएं देने वाली कंपनी और आर्डर लेने वाली कंपनी के बीच समझौता किया जाता है।
उन्होंने बताया कि इंडिया फैक्टरिंग ने साल 2010 से कारोबार शुरू किया है। जिसमें माल्टा के फिम बैंक की 49 फीसदी और पंजाब नेशनल बैंक की 30 फीसदी हिस्सेदारी है। कंपनी अभी 15-16 फीसदी की ब्याज दर ले रही है। जिसके तहत फार्मा, टेक्सटाइल, आईटी एंड हार्डवेयर, स्टील और ऑटो कंपोनेंट के कारोबारी प्रमुख ग्राहक हैं।
देश में इंडिया फैक्टरिंग के अलावा एसबीआई फैक्टरिंग और कैनबैंक फैक्टरिंग आदि कंपनियां भी काम कर रही हैं। हरियाणा चैम्बर ऑफ कामर्स के पदाधिकारी एएल अग्रवाल के अनुसार मांग में आई कमी की वजह से कंपनियों को मिलने वाली भुगतान की अवधि 100 दिन के करीब पहुंच गई हैं। जबकि एमएसएमईडी एक्ट-2006 के अनुसार एसएमई कारोबारियों को 45 दिन के तक भुगतान मिल जाना चाहिए।