मोदी सरकार के पहले बजट में उत्पाद शुल्क में छूट बरकरार रखे जाने को लेकर कार बनाने वाली कंपनियों की कवायद के बाद अब वाहनों के कलपुर्जे बनाने वाली कंपनियां भी इसके लिए आवाज उठा रही हैं।
इन कंपनियों के संगठन ऑटोमोटिव कलपुर्जा निर्माता संघ (एसीएमए) ने नई सरकार से आगामी बजट में इस क्षेत्र के अनुकूल नीति बनाने के साथ ही उत्पाद शुल्क को 10 फीसदी पर बनाए रखने का आग्रह किया है।
एसीएमए के अध्यक्ष हरीश लक्ष्मण ने कहा कि ऑटोमोटिव उद्योग भारतीय अर्थव्यवस्था की महत्वपूर्ण इकाई है, लेकिन फिलहाल इसमें मंदी है। इसलिए यह जरूरी है कि इस उद्योग को गति देने के लिए इस पर विशेष ध्यान दिया जाए। हमें उम्मीद है कि आगामी बजट में इस दिशा में अनुकूल परिणाम देखने को मिलेंगे।
एसीएमए ने ऑटोमोटिव उद्योगों में तेजी लाने के लिए सरकार के समक्ष कुछ सुझाव रखे हैं। इनमें वाहनों के कलपुर्जों पर उत्पाद कर 10 फीसदी बनाए रखने की बात कही गई है। फिलहाल 10 फीसदी का उत्पाद कर 30 जून तक के लिए लागू है। संघ ने अलॉय स्टील, माइल्ड स्टील, एल्युमीनियम अलॉय और सेकेंडरी एल्युमीनियम अलॉय पर सीमा शुल्क समाप्त करने की मांग की है। इन मिश्रित धातुओं का प्रयोग वाहनों के कलपुर्जे बनाने में किया जाता है और इन पर सीमा शुल्क समाप्त होने से कंपनियों के लागत में कमी आएगी।
एसीएमए का कहना है कि बिजली की कटौती ज्यादा होने से उन्हें बिजली के लिए जेनरेटरों पर निर्भर रहना पड़ रहा है, जिससे उनका डीजल का खर्च बढ़ गया है। इसलिए उसने सरकार से डीजल पर लागत ऋण की सुविधा उपलब्ध कराने की मांग की है। इसके अलावा संघ ने कंपनियों द्वारा एक उपभोक्ता के रूप में अदा किए जाने वाले सेवा कर की शत प्रतिशत वापसी (सेनवैट क्रेडिट) उसी साल करने की मांग की है। अभी 50 फीसदी सेनवैट क्रेडिट उसी साल मिलता है, जिस साल सेवा कर दिया गया है और शेष 50 फीसदी अगले साल मिलता है।
एसीएमए ने सरकार से वस्तु एवं सेवा कर जल्द से जल्द लागू किए जाने की मांग की है। संघ ने कंपनी के बाहर अनुसंधान एवं विकास (आरएंडडी) के लिए किए गए खर्च के 200 फीसदी को कर के दायरे से बाहर रखने की मांग की है। फिलहाल कंपनी के अंदर किए गए आरएंडडी पर हुए खर्च के 200 फीसदी तथा बाहर किए गए आरएंडडी के खर्च के 175 फीसदी पर कर में छूट मिलती है। एसीएमए का कहना है कि बजट में पूंजीगत वस्तुओं की अवमूल्यन दर 15 फीसदी से बढ़कर 25 फीसदी किया जाए। साथ ही घरेलू पूंजीगत वस्तुओं की अवमूल्यन दर 40 फीसदी करने की भी मांग की गई है।