लकड़ी के सामान के निर्यात में वुड सर्टिफिकेट की जरूरत बढ़ती जा रही है, लेकिन भारत में कोई सरकारी एजेंसी नहीं है जो प्रमाणित करे कि सामान वैध तरीके से खरीदी गई लकड़ी से बना है या नहीं। इस जरूरत को पूरा करने के लिए हस्तशिल्प निर्यात संवर्धन परिषद (ईपीसीएच) ने वुड सर्टिफिकेट देने की तैयारी शुरू कर दी है।
ईपीसीएच के कार्यकारी निदेशक राकेश कुमार ने बताया कि ग्लोबल मार्केट सिर्फ कानूनी ढंग से खरीदी गई लकड़ी की वस्तुएं ही स्वीकार कर रहा है। यूरोप में गत तीन मार्च से यूरो टिंबर एक्ट लागू होने के बाद हरेक निर्यातक को वुड सर्टिफिकेट दिखाना होगा। इससे प्रमाणित होगा कि लकड़ी पर्यावरण कानूनों को पालन करते हुए खरीदी गई है।
देश में फिलहाल इस तरह का प्रमाण पत्र देने वाली कोई एजेंसी नहीं है। लिहाजा, ईपीसीएच अब इस क्षेत्र में कदम रखने जा रही है। शुक्रवार को दिल्ली में लकड़ी की प्रमाणिकता से जुड़े मुद्दों पर ईपीसीएच ने निर्यातकों के लिए एक सेमिनार का आयोजन किया। इसमें वुड सर्टिफिकेट देने वाली संस्था फॉरेस्ट स्टेवार्ड काउंसिल (एफएससी), वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के अधिकारी और कई प्रमुख हस्तशिल्प निर्यातक शामिल हुए।
हस्तशिल्प निर्यातकों का मानना है कि अमेरिका और यूरोपीय देशों को निर्यात बढ़ाने के लिए सामान की प्रमाणिकता पर जोर देना होगा। वैश्विक बाजार की मांग को देखते हुए भारत में भी वुड सर्टिफिकेशन की व्यवस्था बनानी चाहिए।
राकेश कुमार का कहना है कि ईपीसीएच अंतरराष्ट्रीय संस्था एफएससी इंटरनेशनल के सहयोग से वुड सर्टिफिकेट देना शुरू करेगी। इसके लिए हस्तशिल्प निर्यातकों और वन मंत्रालय के साथ मिलकर प्रयास किए जा रहे हैं।
सेमिनार में एफएससी इंटरनेशनल के डीजी किम कार्टेनसेन, वन महानिरीक्षक अरविंद सिंह के अलावा सहारनपुर, देहरादून और जयपुर के प्रमुख हस्तशिल्प निर्यातकों ने हिस्सा लिया।