दुनिया में छाई आर्थिक सुस्ती से अभी निजात मिलने के आसार नहीं नजर आ रहे हैं। अभी यह दौर आगे भी जारी रहेगा। इसका असर विकसित देशों के साथ-साथ तेजी से उभरती चीन और भारत जैसी अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ेगा। जिसकी वजह से विकासशील देशों खास तौर से गरीब देशों में शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी आधारभूत जरूरतों पर निवेश में कमी आएगी। यह प्रमुख निष्कर्ष संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा विश्व अर्थव्यवस्था पर जारी रिपोर्ट में सामने आएं है।
गुरुवार को संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी की गई रिपोर्ट ‘वर्ल्ड इकोनॉमिक सिचुएशन एंड प्रोसपेक्ट्स 2013’ में कहा गया है कि वैश्विक आर्थिक संकट के चार साल बीतने के बाद भी अभी विश्व अर्थव्यवस्था संघर्ष कर रही है। जो अर्थव्यवस्थाएं कर्ज के संकट से जूझ रही थी उनकी स्थिति और खराब हो गई है। इसे देखते हुए साल 2012 में विश्व सकल उत्पाद (डब्ल्यूजीपी) 2.2 फीसदी रहेगी। यहीं नहीं अगले दो वर्षों में भी इसमें बहुत सुधार होता नहीं दिख रहा है। साल 2013 में यह 2.4 फीसदी और 2014 में 3.2 फीसही रहने का अनुमान है। जो क्षमता से काफी कम होगा।
रिपोर्ट के अनुसार संयुक्त राज्य अमेरिका, यूरोप, जापान जैसी अर्थव्यवस्थाओं की विकास दर में कमी आने के साथ-साथ अब तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाएं चीन, भारत और ब्राजील भी कम विकास दर के तरफ बढ़ रही हैं। रिपोर्ट के अनुसार साल 2012 में संयुक्त राज्य अमेरिका की विकास दर 2.1 फीसदी थी, जो साल 2013 में कम होकर 1.7 फीसदी रह जाने की संभावना है। इसी तरह जापान की 1.5 फीसदी से गिरकर 0.6 फीसदी, यूरोपीय संघ की नकारात्मक 0.3 फीसदी से बढ़कर केवल 0.6 फीसदी ही रहने का अनुमान है।
भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में रिपोर्ट में कहा गया है कि विकास साल 2010 के 9 फीसदी से गिरकर 2012 में 5.5 फीसदी पर आ गई है, जो कि पिछले 10 साल में सबसे धीमी है। इसकी प्रमुख वजह खपत में कमी और निवेश में गिरावट है। इस कारण महंगाई दर लगातार ऊंची रही है। साथ ही ब्याज दरें भी थोड़ा ज्यादा रही हैं। बढ़ता राजकोषीय घाटा और राजनैतिक ठहराव भी एक प्रमुख वजह रहा है। हालांकि भारत की विकास दर साल 2012 की तुलना में थोड़ी बेहतर रहने का अनुमान है। जो कि साल 2012 के 5.5 फीसदी से बढ़कर 2013 में 6.1 फीसदी और 2014 में 6.5 फीसदी रहने का अनुमान है। ऐसा ज्यादा अनुकूल मौद्रिक नीति और बेहतर कारोबारी विश्वास से हो सकता है।
रिपोर्ट में चीन की अर्थव्यवस्था पर चिंता जताते हुए कहा गया है कि चीन की विकास दर भी लगातार कम होती जा रही है। जो कि साल 2010 के 10.3 फीसदी से गिरकर 2012 में 7.7 फीसदी और 2013 में 7.9 फीसदी ही रहने का अनुमान है। रिपोर्ट के अनुसार साल 2013-14 में कच्चे तेल की कीमत औसतन 105 डॉलर प्रति बैरल रहने की उम्मीद है। जो कि साल 2012 की औसत कीमत 110 डॉलर प्रति बैरल से कम है। महंगाई अभी भी पूरी दुनिया में चिंता का विषय रहेगी, खास तौर से विकासशील देशों और गरीब देशों में यह ज्यादा सताएगी।