देश के कृषि उत्पादक क्षेत्रों पर इस साल कमजोर मानसून की सबसे ज्यादा मार पड़ रही है। पूरे देश में सामान्य से ४२ फीसदी कम बारिश दर्ज की गई है, जबकि उत्तर-पश्चिमी भारत में सामान्य से ५३ फीसदी और मध्य भारत में सामान्य से ५८ फीसदी कम हुई है। सूखे का खतरा सबसे ज्यादा उन इलाकों पर मंडरा रहा है, जो देश का अनाज भंडार भरते हैं। कृषि उत्पादक क्षेत्रों में बारिश की अत्यधिक कमी महंगाई और अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर सरकार के लिए कई मुसीबतें खड़ी कर सकती है।
देश की करीब ५५ फीसदी खेती मानसून पर निर्भर है। लेकिन इस साल १७ जून के बाद से मानसून आगे नहीं बढ़ा है। मानसून की यह आंख-मिचौली मौसम विभाग के लिए भी परेशानी का सबब बनी हुई है। मौसम विभाग के मुताबिक, इस मानसून सीजन में पश्चिमी यूपी में सामान्य से ७१ फीसदी कम बारिश हुई है। यही हाल पंजाब का है, जहां सामान्य से ६२ फीसदी कम बारिश हुई है। दलहन और तिलहन उत्पादन में अहम योगदान देने वाले मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्टï्र की हालत तो इससे भी खराब है। मराठवाडा में सामान्य से ७८ फीसदी कम बारिश हुई है, जबकि बारिश में ८९ फीसदी कमी के साथ गुजरात में तकरीबन सूखे जैसे हालात बन रहे हैं। हालांकि, मानसून ने पूर्वी मध्य प्रदेश के कुछ इलाकों में दस्तक दे दी है, लेकिन पश्चिमी मध्य प्रदेश में सामान्य ६८ फीसदी कम बारिश हुई है।
कम बारिश का रिकॉर्ड बनाएगा जून
देश के अधिकांश इलाकों में जून का पूरा महीना मानूसन के इंतजार में गुजरा है। देश के सिर्फ १० फीसदी क्षेत्र में सामान्य बारिश हुई है। मौसम संबंधी सेवाएं देने वाली कंपनी स्काईमेट के मुताबिक, पिछले १० साल में इस बार जून सबसे ज्यादा सूखा रहा है। हालांकि, मौसम विभाग ने ६ जुलाई के बाद मानसून की स्थिति सुधरने की उम्मीद जताई है। लेकिन बारिश में कमी की मार खरीफ की बुवाई पर पड़ रही है। गत २७ जून तक १३.१५ लाख हेक्टेअर क्षेत्र में खरीफ की बुवाई हुई, जो पिछले साल से करीब ३५ फीसदी कम है।