भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) के मुताबिक देश में निवेश और विकास दर को बढ़ाने के लिए मौजूदा समय में रेपो दर में एक फीसदी और नकद आरक्षित अनुपात (सीआरआर) में पौन फीसदी की कटौती जरूरी है। नीतिगत दरों में कटौती की जाती है तो इससे देश में निवेश बढ़ने के साथ औद्योगिक और आर्थिक विकास में भी सुधार होगा। सीआईआई ने चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही की मौद्रिक नीति समीक्षा पूर्व आरबीआई से यह गुहार लगाई है।
सीआईआई के महानिदेशक चंद्रजीत बनर्जी का कहना है कि ऊंची ब्याज दर, लागत और घटते निवेश से औद्योगिक और आर्थिक वृद्धि बुरी तरह प्रभावित हुई है। उन्होंने कहा कि चीन जैसे देश में विकास दर बढ़ाने के लिए नीतिगत दरों में कटौती की जा रही है। इसलिए अक्तूबर के अंत में होने वाली मौद्रिक नीति समीक्षा में आरबीआई को रेपो दर 8 फीसदी से नीचे लाने पर विचार करना चाहिए। इसमें आधा फीसदी की तत्काल कटौती और आधा फीसदी कमी चालू वित्त वर्ष के शेष महीनों में करने की जरूरत है। इसी तरह सीआरआर को 4.5 फीसदी के मौजूदा स्तर से 75 आधार अंक कम करने पर विचार करना चाहिए।
संगठन ने कहा है कि थोक मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई दर अभी भी ज्यादा है, जो चिंता का विषय है। हालांकि ईंधन मूल्य में वृद्धि से मुद्रास्फीति दर पर अनुमान से कम प्रभाव पड़ा है। ऐसी स्थिति में रेपो दर में कमी लाकर निवेश के माहौल में सुधार किया जा सकता है। माना जा रहा है कि मानसून सीजन के अंत में अच्छी वर्षा होने, कच्चे माल की अंतरराष्ट्रीय कीमत घटने और रुपये की मजबूती से भविष्य में महंगाई दर कम हो सकती है।
सीआईआई ने कहा है कि आरबीआई को तेल कंपनियों को डॉलर की आपूर्ति कराने के लिए अस्थाई तौर पर एक खास सिंगल विंडो खोलनी चाहिए। यह विंडो छह माह के लिए खुलनी चाहिए। संगठन ने निजी क्षेत्र के लिए नए बैंकिंग लाइसेंस का दरवाजा खोलने की सलाह भी दी गई है।