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तो क्या 10 डॉलर में मिलेगा एक बैरल तेल?

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तेल के दाम फिर गिरकर 28 डॉलर प्रति बैरल से भी नीचे चले गए हैं। बेंट क्रूड के दाम 27.67 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गए हैं जो 2003 के बाद सबसे कम दाम हैं, जबकि अमरीकी क्रूड के दाम 28.36 डॉलर प्रति बैरल तक गिर गए हैं। बहुत से विश्लेषकों ने 2016 के लिए तेल की कीमतों के अनुमान को कम कर दिया है। मॉर्गन स्टेनली के विश्लेषकों का कहना है कि अगर चीन अपनी मुद्रा का और अवमूल्यन करता है तो तेल के दाम 20 डॉलर प्रति बैरल के आसपास तक भी फिसल सकते हैं।
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रॉयल बैंक ऑफ स्कॉटलैंड के अर्थशास्त्रियों का कहना है कि तेल 16 डॉलर तक गिर सकता है जबकि स्टैंडर्ड चार्टर्ड का अनुमान है कि इसके दाम 10 डॉलर प्रति बैरल तक गिर जाएंगे। तेल के दाम 30 डॉलर प्रति बैरल से नीचे गिरने की वजहें क्या हो सकती हैं। इसमें कैसे सुधार आ सकता है? वैसे तो तेल के दाम गिरने की साफ वजह है आपूर्ति का बहुत ज्यादा और मांग का कम होना।

चीन की आर्थिक रफ्तार कम होने से आमतौर पर वस्तुओं की मांग कम हो गई है जबकि ओपेक देशों में से एक तिहाई तेल का उत्पादन करने वाले सऊदी अरब का जोर उत्पादन कम कर कीमतें बढ़ाने की बजाय अपने बाजार हिस्से को बनाए रखने पर है। ठीक इसी बीच अमरीका के शेल तेल का उत्पादन बढ़ने का मतलब यह हुआ कि अब वह तेल का आयात कम करेगा। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की मांग कम होती है। इससे गैर-अमरीकी और गैर-ओपेक तेल उत्पादकों की मुश्किलें बढ़ जाती हैं, जो कटौती का सामना कर रहे हैं, खासकर उत्तरी सागर में।
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कच्चे तेल के सही दाम कितने होने चाहिए?

अब सवाल यह है कि क्या उत्तरी सागर में 35 डॉलर प्रति बैरल से कम पर तेल का उत्पादन व्यावहारिक है? बीपी, शेल, टोटल और एक्सॉन मोबिल जैसी बड़ी तेल कंपनियों ने इस स्थिति का सामना करने के लिए अरबों पाउंड के निवेश में कटौती की है और हजारों नौकरियां खत्म कर दी हैं। हालांकि चार्ल्स स्टेनली के मुख्य अर्थशास्त्री जेरेमी बैटस्टोन-कार चेताते हैं कि इससे ज्यादा दाम गिरे तो बड़ी कंपनियों को सचमुच में नुकसान होने लगेगा।

वो कहते हैं कि इन बड़ी कंपनियों पर असर का पहला लक्षण तो यह दिखेगा कि वो निवेशकों को मिलने वाले लाभांश में कटौती करेंगी, जिससे वो अब तक बचते रहे हैं। इस बीच वुड मैकेन्जी के तेल विश्लेषक एलन गेल्डेर कहते हैं कि तेल की मौजूदा कीमतों पर भी उत्तरी सागर के बहुत से तेल उत्पादकों को सचमुच में तकलीफ होने लगी है। वो कहते हैं कि उत्तरी सागर में काम करने वाली ये कंपनियां किसी तरह लागत में कमी करके बच पाई हैं। लेकिन गेल्डेर चेताते हैं कि वहां अब भविष्य में निवेश के लिए पैसा नहीं बचा है।

डंडी विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफेसर और मध्य पूर्व के विशेषज्ञ पॉल स्टीवेन्स कहते हैं कि तेल के दाम सैद्धांतिक रूप से 20 से 25 डॉलर प्रति बैरल तक गिर सकते हैं। क्यों? यह एक सामान्य नजरिया हो सकता है लेकिन उन्हें लगता है कि ज्यादातर शेल तेल उत्पादक वर्तमान तेल के दामों को झेल सकते हैं। उनका अनुमान है शेल तेल की उत्पादन लागत 40 डॉलर प्रति बैरल पड़ती है, लेकिन जब तक इसके दाम 25 डॉलर प्रति बैरल तक नहीं आ जाती वह उत्पादन करते रहेंगे।

इस दाम पर कितना तेल खरीदा जा रहा है?

हालांकि गेल्डेर को ऐसा नहीं लगता कि ज्यादा अमेरिकी तेल उत्पादक 50 डॉलर बैरल से नीचे उत्पादन रख पाएंगे। वह कहते हैं, "अमेरिका में कुछ स्थान हैं जहां ऑपरेटर कम दाम में भी उत्पादन जारी रख सकते हैं लेकिन 30 डॉलर से नीचे यह किफायती नहीं है।" गेल्डेर कहते हैं, "बहुत बड़ी संख्या में तेल उत्पादक इस स्तर पर जिंदा नहीं रह सकते। वेनेजुएला, अल्जीरिया, नाइजीरिया में गंभीर वित्तीय समस्याएं पैदा हो रही हैं और दाम बढ़ने, लोगों के बेरोजगार होने से राजनीतिक असंतोष पैदा हो रहा है।"

प्रोफेसर स्टीवेन्स कहते हैं कि दुनिया भर में तेल की आपूर्ति इतनी ज्यादा है कि देशों के पास भंडारण की क्षमता खत्म हो रही है। दुनिया में सबसे ज्यादा भंडारण क्षमता अमेरिका के पास है लेकिन उसके पास भी अब इसे रखने की कोई जगह नहीं बची है। और ऐसा हाल सिर्फ उसका नहीं है। वह कहते हैं, "भंडारण क्षमता का करीब-करीब पूरा इस्तेमाल हो चुका है और लोग अब टैंकर खरीदने के बारे में सोच रहे हैं ताकि भंडारण के लिए उनका इस्तेमाल हो सके।" "लेकिन अगर आपूर्ति मांग से ज्यादा रही तो वह एक ही काम कर सकते हैं कि तेल को बेच दें। इससे फिर दाम और गिरेंगे।"

गेल्डेर का सोचना कुछ और है। वह कहते हैं कि अभी यह साफ नहीं कि अमेरिका के भंडारण पूरे भर चुके हैं। वह कहते हैं, "हम अमेरिकी और यूरोपीय भंडारण स्तर के बारे में जानते हैं लेकिन भारत और चीन आपूर्ति में बाधा आने की सूरत में तेल का भंडारण रणनीतिक रूप से कर रहे हैं।" बैटस्टोन-कार कहते हैं, "जब तक उत्पादन में निश्चित कमी नहीं की जाती कुछ भी नहीं बदलने वाला। और कोटा में संभावित कटौती के लिए हमें जून में होने वाली ओपेक की अगली बैठक तक इंतजार करना होगा।" "और ऐसा ऐसे समय में हो रहा है जब आर्थिक गतिविधियां पहले ही धीमी हो रही हैं, जिससे संकेत मिलते हैं कि मांग ज्यादा नहीं है।"

सऊदी अरब बनाम ईरान का तेल के दामों पर क्या असर पड़ेगा?

प्रोफेसर स्टीवेन्स चेतावनी देते हैं कि तेल के दामों में इसलिए गिरे हैं क्योंकि '1982 के बाद से पहली बार तेल का मुक्त व्यापार हो रहा है'। वह कहते हैं कि ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि सऊदी अरब ने दाम को कायम रखने के लिए उत्पादन कम करने का फैसला नहीं किया- जैसा कि पहले अति आपूर्ति के समय किया गया था।

करीब चार साल पहले अमेरिका ने ईरान पर तेल के निर्यात पर प्रतिबंध लगाए थे जिससे कीमत को कुछ आधार मिला और सऊदी अरब बाजार के बड़े हिस्से पर कब्जा कर सका, जिसे छोड़ने को वह अब तैयार नहीं है। वुड मैकेन्जी की एक रिपोर्ट के अनुसार सऊदी अरब ईरान को जगह देने के लिए उत्पादन कम नहीं करेगा, जो कुछ स्रोतों के अनुसार कुछ हफ्ते में तेल का निर्यात शुरू कर सकता है।

रिपोर्ट में कहा गया है, "सऊदी अरब नवंबर, 2014 की ओपेक बैठक से ही कह रहा है कि जब तक रूस, ईरान और इराक जैसे अन्य तेल उत्पादक अपना तेल उत्पादन नहीं घटाते तेल की कीमत को बनाए रखने के लिए उसका उत्पादन घटाने का कोई इरादा नहीं है।" "सऊदी अरब और ईरान के बीच बढ़ते तनाव से हमारे इस विचार की ही पुष्टि होती है कि सऊदी अरब ईरान को बाजार में उसका हिस्सा देने के लिए उत्पादन घटाने को तैयार नहीं है।"
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इन सबका हमारे लिए क्या मतलब है?

प्रोफेसर स्टीवेन्स कहते हैं, "मध्य पूर्व में तनाव बहुत ज्यादा है। मुझे नहीं लगता कि 1918 में ऑटोमन साम्राज्य के पतन के बाद से स्थिति कभी इतनी खराब रही है।" ऐसी अनिश्चितता सामान्यतः तेल की कीमतों में तेजी लाती है, लेकिन नए साल में दाम बढ़ने के बजाय गिरते ही जा रहे हैं। गेल्डेर कहते हैं कि ज्यादातर व्यापारियों को आशंका है कि सऊदी अरब और ईरान एक-दूसरे से इस कदर होड़ करेंगे कि आपूर्ति गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती है।

फिर मांग में कमी आने से, विशेषकर चीन और उभरते बाजारों में, तेल के दाम बढ़ने की गुंजाइश कम ही नजर आती है। इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि तेल के दाम कम होंगे, हालांकि पेट्रोल पंप से आपको मिलने वाले तेल पर यह गिरावट पूरी तरह नजर नहीं आएगी। यह भी ध्यान रखें कि सरकारें उत्पादन शुल्क से लेकर वैट तक विभिन्न तरह के करों से यह इंतजाम कर रही हैं।

स्वाभाविक है कि जब लोगों को तेल पर ज्यादा पैसा खर्च नहीं करना पड़ता तो वह इसे कहीं और लगाएंगे जिससे अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने की एक संभावना बनती है। हालांकि अगर पेट्रोल से चलने वाली कारें कम खर्च में चलती हैं तो इसका अर्थ यह हुआ कि वह इसके विकल्प, जैसे कि इलेक्ट्रिक वाहनों, में निवेश करने के बारे में कम सोचेंगे। इस तरह दीर्घकाल में पेट्रोल के कम दाम पर्यावरण के लिए हानिकारक रहेंगे।
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