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रुपये की गिरावट ‘अच्छे दिन’ की राह में रोड़ा

Wed, 17 Dec 2014 08:54 AM IST
नई दिल्ली/ सुजय मेहदूदिया
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मोदी सरकार को आर्थिक मोर्चे पर परस्पर विपरीत तरह की स्थितियों का सामना करना पड़ रहा है। एक ओर यूरोप और चीन में मांग घटने के चलते कच्चे तेल की कीमतें गिरकर मई 2009 के बाद के सबसे निचले स्तर 59 डॉलर प्रति बैरल तक आ गई हैं।
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इससे सरकार को आयात बिल में कमी की राहत मिल रही है। दूसरी ओर, रुपये का 59 पैसे गिरकर 13 माह के निचले स्तर 63.53 रुपये प्रति डॉलर पर आ जाना सरकार के लिए सिरदर्द बना हुआ है, क्योंकि इससे राजकोषीय घाटे का बोझ बढ़ सकता है। इसके अलावा निर्यात में गिरावट भी व्यापार घाटे का बोझ बढ़ाने वाली है। कुल मिलाकर यह नकारात्मक चीजें आर्थिक विकास (ग्रोथ) में तेजी को धता बताकर मोदी सरकार के ‘अच्छे दिन’ के नारे पर सवाल उठाती लग रही हैं।

मंगलवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें गिरकर 59 डॉलर प्रति बैरल पर आ गईं। यह मई 2009 में क्रूड की कीमतों के बराबर है। कच्चे तेल में यह गिरावट इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (आईईए) के पूर्वानुमान के अनुरूप ही है, जिसने अगले साल के लिए प्रति दिन 9 लाख बैरल तेल की खपत के अपने अनुमान में 2.3 लाख बैरल प्रति दिन की कमी कर दी है।
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यह तेल उत्पादक देशों के संगठन ओपेक और अमेरिका के एनर्जी इन्फार्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन की रिपोर्टों के अनुरूप ही है। तेल की कीमतों में इस गिरावट की वजह यूरोप और चीन के औद्योगिक उत्पादन में गिरावट आना है, जो वैश्विक कारोबार में रिकवरी पर सवाल खडे़ कर रही है।

मांग में गिरावट के बावजूद ओपेक देशों द्वारा आपूर्ति में कोई कमी न किए जाने के चलते कच्चे तेल की कीमतों में इस साल 50 फीसदी तक की गिरावट आ चुकी है। इसके अलावा अमेरिका में शेल गैस के उत्पादन में आए उछाल ने भी कच्चे तेल के बाजार को नरम किया है।

कच्चे तेल में आई यह भारी गिरावट अब चिंता पैदा कर रही है, क्योंकि इसका नकारात्मक असर अब ग्लोबल अर्थव्यवस्था और वित्तीय बाजारों पर पड़ता दिखने लगा है। तेल में यह गिरावट तब तक जारी रहने के आसार हैं, जबतक ओपेक उत्पादन घटाने का फैसला नहीं करता। फिलहाल ऐसा होता दिखाई नहीं दे रहा है।

इसके अलावा जर्मनी और चीन के कमजोर औद्योगिक आंकड़े ग्लोबल अर्थव्यवस्था को लेकर चिंता बढ़ा रहे हैं। जर्मनी के निजी क्षेत्र की विकास दर इस समय 18 माह के सबसे निचले स्तर पर है। इसी तरह दुनिया में तेल की खपत के मामले में दूसरे सबसे बड़े देश चीन के मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र की हालत भी खस्ता है। यहां एचएसबीसी का पर्चेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (पीएमआई) 7 माह के निचले स्तर 49.5 अंक पर दर्ज किया गया है। इस सूचकांक का 50 अंक के स्तर से नीचे जाना औद्योगिक क्षेत्र में संकुचन की स्थिति को दर्शाता है।

तेल की कीमतों में जारी यह तेज गिरावट दुनिया भर के वित्तीय बाजारों के लिए खतरे की चेतावनी है। खासकर भारत, इंडोनेशिया और रूस जैसे देशों की मुद्राओं के लिए यह संकट खड़ा कर सकती है। इसका अंदाजा इसी बात से किया जा सकता है कि मंगलवार को रुपये के गिरकर 63.53 रुपये प्रति डॉलर पर आ जाने से लगाया जा सकता है। यह 13 नवंबर 2013 के बाद, यानी करीब 13 माह में रुपये का सबसे निचला स्तर है।
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