भारतीय रिजर्व बैंक देश में कम अवधि के कर्ज देने वाली कोऑपरेटिव बैंकिंग में बड़े बदलाव की तैयारी कर रहा है। इसके तहत ग्रामीण क्षेत्रों में होने वाली प्राथमिक कृषि ऋण देने वाली सोसाइटी (पीएसीएस) से लेकर राज्य स्तर तक की कोऑपरेटिव प्रणाली में बदलाव हो सकते हैं। रिजर्व बैंक की विशेषज्ञ समिति की सिफारिश में जहां पीएसीएस के कार्यप्रणाली को सीमित करने की बात कही गई हैं, वहीं वित्तीय रूप से बेहतर काम नहीं करने वाली कोऑपरेटिव बैंकों का विलय करने की भी समिति ने सिफारिश की है।
नाबार्ड के चेयरमैन डॉ प्रकाश बख्शी की अध्यक्षता में गठित विशेषज्ञ समिति ने कहा है कि देश में तीन स्तरीय कोऑपरेटिव प्रणाली की जगह दो स्तरीय प्रणाली होनी चाहिए। यानी, ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाले पीएसीएस के ग्राहकों को जिले स्तर पर काम करने वाले सेंट्रल कोऑपरेटिव बैंक के अधीन कर देना चाहिए।
इसके अलावा, पीएसीएस को बैंकों के अधीन कर उन्हें बिजनेस कॉरस्पाडेंट के रूप में काम करने की सिफारिश समिति ने की है। समिति ने पीएसीएस के लिए कहा है कि किसानों की जमाओं और उन्हें मिलने वाले कर्ज की सुरक्षा के लिए जरूरी है कि वह केवल बिजनेस कॉरस्पाडेंट के रूप में ही काम करें।
समिति ने जिला स्तर पर काम करने वाले सेंट्रल कोऑपरेटिव बैंक के संबंध में सिफारिश करते हुए कहा है कि करीब 60 ऐसे कोऑपरेटिव बैंक हों, जो कि काम करने की स्थिति में वित्तीय रूप से मजबूत नहीं है। ऐसे में इनका विलय दूसरे कोऑपरेटिव बैंकों में कर देना चाहिए। इसके अलावा राज्य स्तर पर कार्यरत कोऑपरेटिव बैंकों में भी बेहतर प्रबंधन की जरूरत है।
समिति ने कोऑपरेटिव बैंकों को भी सीबीएस प्रणाली से जोड़ने, एटीएम सुविधाएं, नेट बैंकिंग सुविधा आदि देने की भी बात कही है। समिति के अनुसार सभी राज्य स्तरीय कोऑपरेटिव बैंक और जिले स्तर पर कोऑपरेटिव बैंकों को इन सुविधाओं को 31 मार्च 2013 तक लागू करने की समय सीमा होनी चाहिए।
इसके अलावा समिति ने बैंकिंग लोकपाल की तरह कोऑपरेटिव बैंक के लिए भी प्रणाली विकसित करने की प्रमुख सिफारिश की है। साल 2012 की शुरुआत तक देश में 33 राज्य स्तरीय कोऑपरेटिव बैंक, 371 जिला स्तरीय कोऑपरेटिव बैंक और करीब एक लाख नौ हजार पीएसीएस हैं।