कोल ब्लॉक आवंटन मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद बैंकिंग इंडस्ट्री पर गंभीर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। बैंकों ने पावर और कोल सेक्टर को करीब 5 लाख करोड़ रुपये का लोन दिया हुआ है। ऐसे में यदि कोल ब्लॉकों का आवंटन रद्द होता है, तो इससे जहां बैंकों का लोन फंस सकता है, वहीं देशभर में करीब 30,000 मेगावाट का बिजली उत्पादन भी प्रभावित हो सकता है। वहीं देश के आर्थिक विकास की रफ्तार पर भी ब्रेक लग सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में 1993 के बाद के सभी कोल ब्लॉकों के आवंटन को गैरकानूनी और विवेकहीन करार दिया है।
कोल सेक्टर पर सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले से वह सभी घटनाक्रम एक बार फिर से सामने आ रहे हैं, जो टेलीकॉम सेक्टर के 2जी घोटाले में सामने आए थे। जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने 2012 में 122 टेलीकॉम लाइसेंस रद्द कर दिए थे। कोर्ट ने अपने आदेश में कोल ब्लॉकों के आवंटन को राष्ट्रीय संपत्ति का अनुचित आवंटन बताया है। कोर्ट की इस टिप्पणी से कोल ब्लॉकों के रद्द होने का खतरा मंडराने लगा है। ऐसे में कुछ बड़ी खनन कंपनियों, स्टील, सीमेंट और पावर उद्योग को कोल ब्लॉक के गंवाने का भय सताने लगा है। वहीं, बैंक और वित्तीय संस्थान भी इस सेक्टर में दिए अपने भारी-भरकम लोन को लेकर चिंतित हैं।
हिंडाल्को, टाटा पावर, भूषण स्टील, एस्सार पावर, रिलायंस पावर, लैंको, जीवीके और अर्सेलरमित्तल जैसी बड़ी कंपनियों को कोल ब्लॉक वापस लिए जाने का डर सता रहा है। यह कंपनियां पिग आयरन, पावर, कोल टू लिक्विड, सीमेंट और स्टील सेक्टरों में कार्यरत हैं। इसी तरह, इन कोल ब्लॉकों से जुडे़ सभी प्रोजेक्टों पर अनिश्चितता गहरा गई है। निजी क्षेत्र की कंपनी जिंदल स्टील एवं पावर को भी कोल ब्लॉक गंवाने का डर सता रहा है। उसका उत्कल कोल ब्लाक, जिसका रिजर्व करीब 14.8 करोड़ टन है, ओडिशा की स्टील परियोजनाओं से संबद्ध हैं।
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) के मुताबिक जून 2014 तक पावर एवं स्टील कंपनियों को बैंक का कुल लोन क्रमश: 84 अरब डॉलर और 44 अरब डॉलर था। इन सेक्टरों को दिए गए बैंक लोन पर बढ़ते दबाव का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि स्टील सेक्टर में कंपनियों के 52 लोन अकाउंट और पावर सेक्टर में 16 लोन अकाउंट जून 2014 तक बैंकों द्वारा पुनर्गठित किया जाना था। विश्लेषकों का कहना है कि यदि कोल ब्लॉकों का आवंटन रद्द होता है, तो 30,000 मेगावाट बिजली उत्पादन प्रभावित हो सकता है क्योंकि सरकारी और निजी क्षेत्र की विभिन्न बिजली परियोजनाओं को कोल आपूर्ति ठप हो जाएगी।
रेटिंग एजेंसी कार्वी के मुताबिक बैंकिंग सेक्टर ने पावर सेक्टर को 50.1 खरब रुपये (5 लाख करोड़ रुपये) का लोन दिया हुआ है। यह मार्च 2008 के नॉन फूड क्रेडिट के 4.3 फीसदी के मुकाबले जून 2014 में बढ़कर 8.83 फीसदी हो गया। इस दौरान बैंकों ने कई नए पावर प्रोजेक्ट को लोन उपलब्ध कराए, जिन पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का नकारात्मक असर पड़ सकता है।
कार्वी के विश्लेषक आशुतोष कुमार मिश्र का कहना है कि यदि कोल ब्लॉकों का आवंटन रद्द होता है, तो इन लोन की रिकवरी की संभावनाओं पर प्रतिकूल असर हो सकता है। यदि कंपनियां लोन चुकाने में विफल होती हैं, तो बैंकों को अपने लोन को डूबा हुआ मान लेना होगा या उन्हें एपीए घोषित करना होगा।
हालांकि, कोल मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि कोर्ट के फैसले का मतलब यदि कोल ब्लॉकों को रद्द करने से होता है, तो सरकार इससे निपटने को तैयार है। कम से कम उनका मानना है कि इससे व्यवस्था की गंदगी को साफ करने में मदद मिलेगी और प्राकृतिक संसाधनों के मसले पर पारदर्शिता की नई व्यवस्था लाई जा सकेगी।