वित्तीय समावेशन के तहत खोले गए नो-फ्रिल खातों में फर्जीवाड़े की आशंका है। इसे देखते हुए देश के प्रमुख बैंकों ने वित्त मंत्रालय के निर्देश के बाद जांच शुरू कर दी है। सूत्रों के अनुसार बैंक इसके तहत यह देख रहे हैं कि जो खाते खोले गए हैं, उसका लाभ सही हकदार को मिल रहा है कि नहीं, सही मायने में नो-फ्रिल खाते खुले हैं कि नहीं, खातों का दुरुपयोग तो नहीं किया जा रहा है। आरबीआई की रिपोर्ट के अनुसार देश में मार्च 2012 तक 10.32 करोड़ नो-फ्रिल खाते हैं।
वित्तीय समावेशन योजना के तहत ऐसे लोगों को खातों खोल कर बैंकों जोड़ा जा रहा है, जो कि बैंकिंग प्रणाली से नहीं जुड़ पाए हैं। इसी के तहत सरकार ने मार्च 2012 तक दो हजार से ज्यादा की आबादी वाले गांवों में लोगों के नो-फ्रिल (जीरो बैलेंस) वाले खातों के खोलने का लक्ष्य बैंकों को दिया था। इसके तहत बैंकों ने 72 हजार से ज्यादा गांवों में यह खाते खोले थे। नए नियम के तहत अब दो हजार से कम की आबादी वाले गांवों को भी जोड़ा जा रहा है।
सूत्रों के अनुसार वित्त मंत्रालय को इस तरह की शिकायतें मिली हैं कि इन खातों में बहुत से ऐसे खाते हैं जिनमें काफी अनियमितताएं हैं। इसे देखते हुए सभी बैंकों से कहा गया है कि वह इनकी जांच करे। एक प्रमुख बैंक के वरिष्ठ अधिकारी ने अमर उजाला को बताया कि फर्जी खाते खुलने, जो खाते खुले हैं उनका क्या इस्तेमाल हो रहा है। उसमें रुपये के लेन-देन में कोई अनियमितता तो नहीं है।
इसके अलावा खाताधारकों को बॉयोमेट्रिक कार्ड मिले हैं कि नहीं, जिन किसानों के यह खाते खुले हैं वह अपनी अतिरिक्त राशि को कहां रख रहे हैं, वह नो-फ्रिल खातों का इस्तेमाल कर रहे हैं कि नहीं आदि की पड़ताल की जा रही है। एक अन्य सार्वजनिक बैंक के अधिकारी के अनुसार, इसके अलावा वित्त मंत्रालय से इस बात के भी निर्देश मिले हैं कि नए खाते खोलने की प्रक्रिया में पहले की तुलना में ज्यादा निगरानी रखी जाए। इसके लिए जरूरी कदम उठाए जाएं।