सहकारी चीनी मिलों का केंद्र सरकार पर करीब 200 करोड़ रुपये बकाया है।
वर्ष 2006-07 और 2007-08 में सरकार ने चीनी निर्यात को बढ़ावा देने के लिए एक्सपोर्ट पर सब्सिडी देने का फैसला किया था, लेकिन कई चीनी मिलों को अभी तक एक्सपोर्ट सब्सिडी का भुगतान नहीं मिला है।
सहकारी चीनी मिलों के संघ ने केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार को पत्र लिखकर बकाया भुगतान कराने की मांग की है।
राष्ट्रीय सहकारी शक्कर कारखाना संघ लिमिटेड (एनएफसीएसएफ) के अध्यक्ष कल्लप्पा बी. अवाड़े ने शरद पवार को लिखे पत्र में कहा है कि कई सहकारी चीनी मिलों का करीब 200 करोड़ रुपये का सब्सिडी क्लेम सरकार के पास अटका हुआ है।
सब्सिडी मिलने की उम्मीद में चीनी मिलों ने उस वक्त कुछ घाटा उठाकर चीनी का निर्यात किया था। महाराष्ट्र और कर्नाटक में सूखे की मार झेल रही चीनी मिलों को इस बकाया राशि के भुगतान से काफी राहत मिलेगी।
चीनी पर 30 फीसदी आयात शुल्क की मांग
पाकिस्तान से चीनी के आयात से घबराई चीनी मिलों ने चीनी पर आयात शुल्क बढ़ाने की मांग की है। सहकारी चीनी मिलों के संघ ने केंद्रीय खाद्य मंत्री केवी थॉमस को पत्र लिखकर कच्ची और रिफाइंड चीनी पर आयात शुल्क 10 से बढ़ाकर 30 फीसदी करने की मांग की है।
पत्र के मुताबिक, 23 मार्च तक 4.68 लाख टन चीनी का आयात हो चुका है, जबकि वर्ष 2012-13 में चीनी उत्पादन घरेलू मांग से 25 लाख टन ज्यादा रहने का अनुमान है। घरेलू जरूरत पूरी करने के बाद भी 38.68 लाख टन चीनी का सरप्लस रहेगा, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में चीनी का दाम कम होने की वजह से निर्यात नहीं हो सकता।
गन्ना किसानों का 12 हजार रुपये बकाया
चीनी मिलों पर गन्ना किसानों का बकाया भुगतान बढ़कर 12 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा हो गया है। राष्ट्रीय सहाकरी शक्कर कारखाना संघ लिमिटेड के मुताबिक, 15 मार्च तक गन्ने का बकाया भुगतान 12,600 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है।
गत अक्तूबर में चीनी का एक्स फैक्ट्री दाम 3,328 रुपये प्रति क्विंटल था, जो अप्रैल में घटकर 2925 रुपये प्रति क्विंटल पर आ गया। संघ का कहना है कि चीनी के दाम में 400 रुपये की गिरावट के चलते मिलों के लिए गन्ने का भुगतान करना मुश्किल हो रहा है।