टेलीविजन बच्चों को किताबों से दूर करता है तो अखबार उन्हें किताबों के नजदीक लाता है। जिन घरों में अखबार आता है वहां बच्चे पुस्तकों में ज्यादा रुचि लेते हैं। अखबार बच्चों में छपे हुए शब्दों के प्रति एक तरह का लगाव भी पैदा करता है। जबकि टेलीविजन वाले घरों में बच्चों में पढ़ने की आदत कम पाई गई है। नेशनल यूथ रीडरशिप सर्वे की एक फॉलोअप रिर्पोट में यह बात सामने आई है।
इस सर्वे में युवाओं की पढ़ने की आदतों पर एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की गई है। इसके लिए देश में स्कूली शिक्षा के अतिरिक्त किताबों के पढ़ने की आदतों पर किये गये सर्वेक्षण को आधार बनाया गया है। मानव संसाधन मंत्री पल्लम राजू ने इस रिपोर्ट को जारी किया।
युवाओं की साहित्यिक पुस्तकों को पढ़ने में रुचि संबंधी आंकड़ों में पाया गया कि युवाओं में पढ़ने की आदत बढ़ाने में अखबार बहुत सहायक होता है। रोजाना अखबार खरीदने वाले घरों में बच्चों में साहितियक पुस्तकों को पढ़ने में रुचि अधिक होती है। इसके अलावा जिन घरों मे टेलीविजन नहीं थे वहां भी युवाओं में पढ़ने की आदतें ज्यादा पाई गईं।
सर्वे से यह भी पता लगा कि नियमित वेतनभोगी, खेतीबारी से जुड़े युवा छात्र, बेरोजगार और घरेलू कामों में हाथ बटाने वाले लोगों की तुलना में पुस्तकें पढ़ने में कम रूचि लेते हैं। इसी तरह युवाओं के पढ़ने संबंधी आदतों पर आसपास किताबों की दुकानों की उपलब्धता, लाइब्रेरी की सदस्यता, स्कूलों में शिक्षकों द्वारा बच्चों को किताबें पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किए जाने आदि का भी प्रभाव पड़ता है। इसी तरह पारिवारिक बनावट का भी पुस्तकों के पढ़ने की रुचियों पर प्रभाव देखा गया है।