उत्तर प्रदेश में मैनपुरी में श्रंगी ऋषि आश्रम में खुदाई के दौरान मूर्तियों के साथ मिले प्राचीन नर कंकाल में अघोरी और तांत्रिकों की दिलचस्पी बढ़ गई हैं। ये लोग आश्रम पहुंच रहे हैं और इसे खरीदने के लिए वह आश्रम संचालकों से बोलियां लगा रहे हैं।
आठ-दस लाख तक कंकाल के सिर की बोली लगाई जा चुकी हैं लेकिन आश्रम संचालक इसे बेचने को तैयार नहीं हैं। प्राचीन मूर्तियों और कंकाल के चोरी होने की आशंका में आश्रम की सुरक्षा कड़ी कर दी है और साधु संत रात भर जागकर पहरा दे रहे हैं।
जसराना रोड पर स्थित प्राचीन श्रंगी ऋषि आश्रम में पहले तपसी बाबा रहते थे। चालीस साल पहले लैंप की लौ से उनकी झोपड़ी में आग लग गई थी और उसमें उनकी मौत हो गई थी।
इस हादसे के पांच साल तक आश्रम पर कोई साधु नहीं आया था। 35 साल पहले स्वामी चेतनानंद अपने गुरु स्वामी दास के साथ औंछा आए थे। उन्होंने ही मंदिर का सौंदर्यीकरण कराया और अब एक मंदिर का निर्माण करा रहे है।
गत नौ जुलाई को आश्रम में खुदाई के दौरान एक नर कंकाल और उसके कुछ दूरी पर मां दुर्गा, शेर, भगवान शंकर की मूर्ति के अलावा पत्थर के खड़ाऊ और पुरानी कलाकृतियां बने पत्थर मिले हैं। एक पुरानी नींव भी यहां मिली।
कंकाल के बारे में बताया जा रहा है कि यह लगभग से दस से 11 फीट लंबे किसी व्यक्ति का रहा होगा। इनको आश्रम परिसर में ही सुरक्षित रख लिया गया। आश्रम के प्रबंधक स्वामी चेतनानंद की मानें तो इस क्षेत्र में हजारों ऋषि मुनियों ने समाधि ली हैं, उन्हीं किसी का यह कंकाल हो सकता है।
औंछा में हैं सैकड़ों टीले और समाधियां
औंछा के बारे में मान्यता है कि यह क्षेत्र 88 हजार ऋषि मुनियों की तपस्थली रहा है। जसराना और एटा रोड पर दो किमी के दायरे में आज भी सैकड़ों टीले और ऋषि मुनियों की समाधियां हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार नैमिष ऋषि तपस्या कर रहे थे तथा राजा परीक्षित ने उनके गले में मरा हुआ सांप डाल दिया था।
नैमिष ऋषि के पुत्र श्रंगी ऋषि को अपने पिता के अपमान का पता चला तो उन्होंने राजा परीक्षित को श्राप दिया था कि राजा की मौत सर्पदंश से ही होगी। बाद में नैमिष ऋषि ने इसी तपस्थली पर ही समाधि ली थी। श्रंगी ऋषि ने भी उसी स्थान पर आकर तपस्या की और यहीं समाधि ली।