नवरात्र चल रहे हैं और दशमी को उल्लास और जश्न के साथ धू धू कर जल उठेगा खलनायक रावण। सैंकड़ों फीट लंबा और पटाखों से भरा रावण अपने भाइयों के साथ धू धू जलेगा और जनता जय श्री राम के नारे लगाएगी। दरअसल विजयदशमी पर पुतला दहन का अपना ही अंदाज है। विजयदशमी के दिन रामायण' का खलनायक रावण श्रीराम के हाथों मरकर भी नहीं मरेगा जब तक उसका पुतला न जला लिया जाए। पुतला बन कर जलने वाले रावण पर महंगाई का खौफ नहीं है। देश भर में लंबी मूंछों और ऊंचे कद वाले तैयार रावण के पुतले बन रहे हैं। साल में एक बार रावण बनाने वाले कारीगरों की जमकर कमाई होती है। राह चलते लोगों के लिए मैदान में बन रहे ये पुतले आकर्षण का केन्द, है. छोटे बच्चों के लिए सडक किनारे सजे धजे रावण कौतूहल का विषय भी हैं।
रावण के पुतले में मुख्य आकर्षण होता है उसकी लंबी मूंछें और दस सिर। रावण के पुतले की कीमत उसकी ऊंचाई और सुंदरता पर निर्भर है। रावण के पुतलों की कीमत साढे पांच हजार रुपए से शुरू होकर एक लाख तक होती है। मूलरूप से हरियाणा निवासी ओम प्रकाश दिल्ली नगर निगम के कर्मचारी है लेकिन रावण बनाने की पुश्तैनी कला को आगे बढाने के लिए दो महीने की छुट्टी लेकर रावण बनाने का काम पूरा कर रहे हैं। अपने पिता के काम में बचपन से ही हाथ बंटाने वाली ओम प्रकाश की बेटी सोनिया बताती है कि उन्होंने रावण. मेघनाथ और कुंभकर्ण का सेट 45 हजार में बेचा है।
इसी कारोबार में लगे उत्तर प्रदेश के धीरज कुमार ने बताया कि तिलक नगर से रावण का आर्डर आया है जिसकी मूंछें 36 फुट लंबी रखने की फरमाइश की गई है। धीरज के ही साथ इस काम में लगे मोहन बताते हैं कि मूंछे शान का प्रतीक होती हैं। इसलिए कारीगर और खरीददार दोनों ही इस पर विशेष ध्यान देते हैं।
रावण के पुतले बनाने का कामम दो महीने पहले ही शुरू हो जाता है। बांस को मोडकर और अलग. अलग जगहों पर बांधकर ढांचा तैयार किया जाता है फिर इसके उपर पतली साडी लपेटी जाती है। एक बार ढांचा तैयार हो जाने के बाद कारीगर अपनी चि के मुताबिक इस पर काला या बादामी कागज चिपकाते हैं। महंगाई का असर बांस. चमकीला कागज और लेई तैयार करने
के सामान पर पडा है। इसी कारण से ये कारीगर सीमित संख्या में पुतले बना रहे हैं। कुंभकर्ण की मूछों को चमकाते हुए कारीगर राजेन्द, ने बताया कि उन्होंने पिछली बार 20 फुट का रावण बनाया था, जो 95 हजार पए में बिका था।