हममे से शायद ही कोई ऐसा हो जिसने कभी झूठ नहीं बोला हो। हम और आप अपनी किसी न किसी छोटी-बड़ी जरूरत के लिए झूठ बोलते ही हैं।
लेकिन अब अगर आप झूठ बोलते पकड़ जाएं और कोई आपसे पूछे कि झूठ बोलना कहां से सीखा...? तो आप बता सकते हैं कि अपने पूर्वजों यानी बंदरों से।
डेली मेल की खबर के मुताबिक चिंपैंजी और बंदरों के व्यवहार का अध्ययन कर शोधकर्ता इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि हमारे ये पूर्वज खाने-पीने की चीजों के लिए अपने दोस्तों और साथियों से झूठ बोलते थे।
शोधकर्ताओं का मानना है कि इंसान में झूठ बोलने की प्रवृत्ति यहीं से विकसित हुई होगी। इसके लिए शोधकर्ताओं ने करीब 24 प्रजाति के बंदरों पर अध्ययन किया।
डबलिन के ट्रिनिटी कॉलेज के शोधकर्ता ल्यूक मैकनली के अनुसार झूठ बोलना एक उद्देश्य के तहत होता है। इसमें आपसी संबंधों को सहज बनाए रखने के लिए भी झूठ बोला जाता है। मानवों में यह आदत पूर्वज बंदरों से आई है। न केवल बंदर बल्कि मकड़ियां भी अपने साथी को रिझाने के लिए झूठ का सहारा लेती हैं।
ऐसे में यह स्पष्ट हो जाता है कि झूठ बोलना भी विकास क्रम की एक प्रक्रिया है तो हमारे पूर्वजों से हमें मिली है। हालांकि ये बात जरूर है कि हमारे पूर्वज जहां केवल खाने-पीने की चीजों और साथी को खुश करने के लिए ही झूठ बोला करते थे वहीं हम अपनी हर छोटी-मोटी जरूरत और लाभ के लिए झूठ बोलने लगे हैं।