नशे में धुत लड़कियां। कुछ ने तो इतनी पी रखी है कि लड़खड़ाकर गिर पड़ती हैं। कुछ मदहोशी के आलम में एक-दूसरे से झगड़ पड़ती हैं। तो कई गुस्से ओर नशे के सरूर में एक-दूसरे के बाल नोंचने लगती हैं। यह किसी झुग्गी-बस्ती का नजारा नहीं है बल्कि दिल्ली के मशहूर नाइट क्लबों का आम नजारा है। इन अमीर खूबसूरत और मदहोश लड़कियों को संभालने की जिम्मेदारी महिला बाउंसरों पर है।
इस बारे में जब अमर उजाला ने ग्रेटर कैलाश वन स्थित अर्बन पिंड की महिला बाउंसर सुनीता चौहान से बात की तो उन्होंने कहा, ‘यह तो हमारा रोज का काम है।’
नाइट क्लब, पब, बार में महिला बाउंसरों का चलन तेजी से बढ़ रहा है। दिल्ली, नोएडा, गुड़गांव सहित देश के विभिन्न शहरों में स्थित क्लब अब महिला बाउंसर रखने लगे हैं।
कुछ साल पहले तक भारत में बाउंसरों का प्रचलन नहीं था। 2008 में महिला बाउंसरों का नाम तब गूंजा, जब पंजाब की दो लड़कियों अमनदीप कौर और मनप्रीत जोहल ने चंडीगढ़ स्थित स्कोर नाइट क्लब में बतौर महिला बाउंसर काम शुरू किया। अमनदीप और मनप्रीत ने अपने इस चैलेंजिंग काम की बदौलत देश ही नहीं विदेशी मीडिया में भी सुर्खियां बटोरी।
अमनदीप ने एक इंटरव्यू में कहा, ‘जब मैंने बाउंसर बनने की इच्छा जताई तो सभी ने मेरा मजाक बनाया। नाइट क्लब के अधिकारियों ने यह कहते हुए मुझे काम देने से मना कर दिया कि यह मुमकिन नहीं है, यह काम सिर्फ आदमी कर सकते हैं।’ लेकिन आजकल की लड़कियां उस नियम को खारिज कर चुकी हैं जिसमें उन्हें दूसरों की मर्जी से जीना होता था। अमनदीप ने भी वही किया।
आज दिल्ली सहित देश के कईं छोटे-बड़े नाइट क्लबों में महिला बाउंसरों की अच्छी खासी संख्या है और इनकी मांग लगातार बढ़ती जा रही है। आजकल तो विभिन्न साइट्स पर बाउंसरों के लिए जॉब भी मौजूद है।
ब्रिज सिक्योरिटी के मालिक विजयपाल उर्फ बिज्जू पहलवान कहते हैं, ‘हमारा काम क्लबों को बाउंसर और सिक्योरिटी गार्ड मुहैया कराना है। वर्तमान में हम दिल्ली और नोएडा के 25-30 क्लबों में अपनी सेवाएं दे रहें हैं। पहले तो सिर्फ पुरुष बाउंसरों की डिमांड थी, अभी पिछले कुछ सालों से महिला बाउंसरों का प्रचलन शुरू हुआ है और यह लगातार बढ़ता ही जा रहा है।
क्लब में आने वाली महिलाओं की जांच करने, उन्हें कोई दिक्कत आने पर मदद करने या आपस में लड़ाई-झगड़ा होने पर उन्हें अलग करने का जिम्मा महिला बाउंसरों पर होता है।’
महिला बाउंसरों की कमाई के बारे में पूछने पर बिज्जू पहलवान बताते हैं, ‘अधिकतर नाइट क्लब सप्ताह में चार दिन (बुधवार से शनिवार) ही खुले रहते हैं। कुछ क्लब प्रतिदिन के हिसाब से तो कुछ मासिक भुगतान करते हैं। वैसे एक महिला बाउंसर 12-15 हजार रुपये प्रतिमाह कमा लेती हैं।’
कुछ नाइट क्लबों में आज भी महिला बाउंसर रखने का रिवाज नहीं है। गुड़गांव स्थित लॉस्ट चांस और नोएडा स्थित एलिवेट नाइट क्लब के अधिकारियों से जब महिला बाउंसरों के बारे में बात की गई तो उनका सपाट सा जवाब था, ‘हम सिर्फ पुरुष बाउंसर रखते हैं, हमारे क्लब में कोई महिला बाउंसर नहीं हैं, क्योंकि हमें इसकी जरूरत नहीं है।’
रात 10 से सुबह 5 तक गुलजार रहने वाले नाइट क्लब जिंक्स (नेहरु प्लेस) के मैनेजर नवदीप इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते कि नाइट क्लबों को महिला बाउंसरों की जरूरत नहीं होती। वह कहते हैं, ‘क्लब में महिला बाउंसर होना बहुत जरूरी है।
लड़कियां किसी परेशानी के दौरान पुरुष बाउंसरों के पास जाने में हिचकिचाती हैं। महिला बाउंसरों से उनका काम आसान हो जाता है। जब हमारे कस्टमर में महिला और पुरुष दोनों हैं तो बाउंसर महिला और पुरुष क्यों नहीं हो सकते?’
बाउंसरों का काम इतना आसान नहीं है। बाउंसर बनने के लिए काफी स्टेमिना चाहिए। कनॉट प्लेस स्थित नाइट क्लब अग्नि की महिला बाउंसर अनिता रावत कहती हैं, ‘बाउंसरों को शारीरिक रूप से ही नहीं मानसिक रूप से भी स्वस्थ होना चाहिए। बाउंसर के रूप में आपको काफी धैर्यवान होना पड़ता है। बाउंसर का बर्ताव गंभीर लेकिन खुशगवार होना जरूरी है, क्योंकि गुस्सैल बाउंसरों से क्लब का नाम खराब होता है।’
‘बाउंसर’ शब्द का उपयोग सबसे पहले 19 वीं सदी के प्रसिद्ध अंग्रेजी लेखक होरेटियो एलगर जूनियर ने अपने उपन्यास ‘द यंग आउट लॉ’ में किया था, तभी से यह शब्द प्रचलित हुआ। तब शायद एलगर ने भी नहीं सोचा होगा कि 21 वीं सदी के आते-आते महिलाएं भी बाउंसर बनने लगेंगी। अब वह गुजरे जमाने की बात हुई जब महिलाओं की सुरक्षा की जिम्मेदारी पुरुषों पर होती थी। आज महिलाएं किसी भी मामले में पुरुषों से पीछे नहीं रहना चाहतीं।