आपके आसपास भी कुछ ऐसे लोग होंगे जिन्हें आप 'भोंदू' कहते होंगे। क्या पता आपको भी लोग पीठ पीछे इसी नाम से पुकारते हों। अगर ऐसा हो तो बुरा मनाने की जरूरत नहीं। आमतौर पर भोंदू होने में आपका नहीं आपके दिमाग का योगदान है।
गौर कीजिए कि अगर आपका बच्चा बार-बार समझाने पर भी आपकी बात नहीं मानता है, या फिर वह कोई काम जल्द नहीं कर पाता है, या आपको खुद कई बार चीजें याद नहीं रहती हैं, तो कसूर आपका नहीं आपके धीमे दिमाग का है।
दरअसल, ऐसे बच्चों या लोगों का दिमाग संवेदी सूचनाओं को पर्याप्त रूप से ग्रहण नहीं कर पाता है। जर्मनी के वैज्ञानिकों ने अपने एक नए शोध में यह दावा किया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसे लोगों की मुख्य समस्या यह नहीं है कि उनकी सीखने की प्रक्रिया काफी धीमी है, बल्कि यह है कि सूचनाओं को याद रख पाने में ऐसे लोगों का दिमाग ही पर्याप्त तरीके से काम नहीं कर पाता है।
अपने प्रयोग में वैज्ञानिकों ने पता लगाया कि किसी भी क्रिया के फलस्वरूप दिमाग में उठने वाली अल्फा तरंगे ही सीखने या याद रख पाने की क्षमता का निर्धारण करती हैं। बोकम की रूर यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक डॉ. हूबर्ट डेंस के मुताबिक, ‘अल्फा तरंगों की यह गतिविधि काफी अहम है। दुर्घटना के समय उपचार के दौरान इसकी उपयोगिता तो और भी बढ़ जाती है। खास तौर पर चीजों को याद रखने और उसके बारे में समझ विकसित करने में।’
इन तरंगों की गतिशीलता जितनी ज्यादा होगी, इंसान की चीजों के प्रति सीखने की समझ में उतना ही इजाफा होगा। ये गतिविधियां दिमाग के सोमैटो सेंसरी कॉर्टेक्स में घटित होती हैं, जो स्पर्श के प्रति दिमाग को संवेदनशील बनाता है। यह शोध जर्नल ‘न्यूरोसाइंस’ में प्रकाशित हुआ है।