जब भी बादल उमड़ते-घुमड़ते थे तब-तब जीएमएस रोड स्थित प्रियदर्शनी कालोनी में रहने वाले भूपेंद्र सिंह और उनके परिवार का कलेजा कांप उठता था। सड़क के तल से तीन फीट नीचे बने मकान में मामूली बरसात बाढ़ ला देती थी। अब उन्होंने इसका उपाय ढूंढ लिया है। जैक की मदद से उनका आशियाना उठाया जा रहा है। रोचक बात यह है कि घर के लोग उसमें रहकर आराम से अपने रोजमर्रा के काम भी कर रहे हैं।
भूपेंद्र बताते हैं कि बरसात के सीजन में उनके घर का निचला फ्लोर पानी में ही डूबा रहता था। पानी की निकासी का हर जतन करके वह परेशान हो गए थे। उनकी पत्नी अक्सर सोते जागते यही कामना करती रहती काश! भगवान मेरे घर को थोड़ा सा लिफ्ट करा दो। एक दिन मोहम्मद दिलशाद उनके सामने के घर को लिफ्ट (ऊपर उठाने) करने की तकनीक लेकर आए तो वे लोग उछल पड़े। पूरी जानकारी ली और अपना घर लिफ्ट करवाने का फैसला लिया।
पिछले तीन दिन से उनके घर को ऊपर करने का काम चल रहा है। अबतक उसे एक फीट तक उठाया भी जा चुका है। पहले दिन तो भूपेंद्र का परिवार काम शुरू होने से पहले ही बाहर निकल गया। डर था कि मकान ऊपर उठाते समय कोई घटना ना हो जाए। लेकिन जब शाम के समय ऊपरी मंजिल पर लोगों ने खा-पीकर नींद ली तो डर दूर हो गया। नीचे के फ्लोर पर लिफ्टिंग के काम में लगे लोग आराम भी फरमाते हैं।
ऐसे हो रहा है मकान ऊपर
मकान के चारों ओर नींव से कुछ ऊपर दीवारों में पूरी लंबाई में ढेर सारे जैक लगाए गए हैं। जिन्हें दिलशाद के निर्देश पर एक-एक घुमाया जाता है। उनकी टीम के सभी 20 मेंबर एक साथ उस हिस्से का एक साथ घुमाते हैं। यह सिलसिला पूरे 25 दिन चलेगा। भूपेंद्र के पूरे मकान में 250 जैक लगाए गए हैं।
चंडीगढ़ से सीखी तकनीक रुड़की के दिलशाद ने
रुड़की के पास मंगलौर के रहने वाले दिलशाद ने यह तकनीक चंडीगढ़ में सीखी। अभी तक वह कई राज्यों में करीब 400 मकानों को लिफ्ट कर चुके हैं। देहरादून में चार मकानों में इस तकनीक का सफल प्रयोग किया जा चुका है। मकान लिफ्ट करने के लिए करीब तीन लाख तक का खर्च आता है। वैसे प्रति स्क्वायर फीट कीमत 120 रुपये लगता है। क्योंकि इसमें फर्श और चौखट तोड़ना पड़ता है इसलिए उसे बनाने का खर्च अलग से आएगा।