जुनून को किसी कारवां की जरूरत नहीं होती, न ये किसी मोह का मोहताज होता है। जुनून वह संकल्प है जो दृढ़ निश्चय की राह में आने वाली हर बाधा को जीतता है। 75 साल के बुजुर्ग गब्बर सिंह राणा का संवेदनाओं से भरा हृदय और 42 साल की संघर्षगाथा जुनून और जज्बे से भरी है। जानवरों की खातिर इंसानियत की इस लड़ाई में गब्बर सिंह ने अपनी पूरी जवानी लगा दी, अब बुढ़ापे में जज्बा और जोर मारता है। बेजुबान पशुओं को बचाने के लिए गब्बर ने क्या नहीं छोड़ा? गांव छोड़ा, घर त्यागा, पैर कट गया, पता ही नहीं चला कि दो छोटे से बेटे कब बड़े हो गए और पूरा घर संभालने लगे। गब्बर को तो बस इतना पता है कि उन्हें अपने संघर्ष में अब तक कितनी सफलता मिली और आगे कितनी लड़ाई। धार्मिक आस्था के नाम पर निरीह पशुओं का संहार रोकने में उन्हें कामयाबी भी मिली, लेकिन यह अंत नहीं।
रुद्रप्रयाग के कालीमठ के रहने वाले गब्बर सिंह राणा को किसी सीमा में बांधना सही नहीं होगा। वह हर उस जगह के निवासी हैं जहां पशुबलि के खिलाफ लोग चाहिए। आस्था के नाम पर पशुओं की हत्या के खिलाफ 70 दशक में गब्बर सिंह का सफर शुरू हुआ। कई वर्षों तक लोगों को जागरूक करने के बाद 26 वर्ष पूर्व उन्होंने केदारनाथ क्षेत्र के कालीमठ मंदिर में पशुबलि के खिलाफ आवाज उठाई। मंदिर का बलिदान गृह तोड़ उन्होंने लड़ाई का आगाज किया। बेजुबान पशुओं के पक्ष में खड़े होने का खामियाजा मुकदमों के रूप में मिला। लेकिन सच परेशां हो सकता है, पराजित नहीं। यही गब्बर के साथ भी हुआ। कालीमठ मंदिर के पुजारी भी गब्बर के जज्बात समझे। समझौता हुआ और इस मंदिर में बलि प्रथा बंद हो गई।
गांव-परिवार छोड़कर दशकों से कालीमठ में रह रहे गब्बर ने अपना दूसरा लक्ष्य बनाया कांडा देवालय (श्रीनगर) को। यहां उनकी भावनाओं के आगे हर कोई झुका। आम आदमी से लेकर पुलिस-प्रशासन तक। हर साल देवालय में भैया दूज पर लगने वाले मंजू घोस मेले में बलि देने की प्रथा तब से रुकी है। अब वह बीरोंखाल के ऐतिहासिक कालिंका मंदिर को भी पशु बलि से बिल्कुल मुक्त करना चाहते हैं। इस मंदिर में हर तीन साल में लगने वाले मेले में सैकड़ों पशुओं की बलि दी जाती है। यह मंदिर पौड़ी और अल्मोड़ा-बागेश्वर की सीमा पर है। इसके लिए बीरोंखाल के लोगों को जगाकर अब गब्बर नैनीताल और बागेश्वर की तरफ निकल पड़े हैं ताकि 2014 में कालिंका मंदिर में लगने वाले मेले में किसी बेजुबान पशु की हत्या न हो।
पशुओं के लिए लड़ी गई इस लंबी लड़ाई में गब्बर ने बहुत कुछ गंवाया। सबसे बड़ा नुकसान तीन साल पहले तब हुआ जब अभियान के दौरान हुई एक दुर्घटना के बाद उनका पैर काटना पड़ा। गब्बर का पैर कटा लेकिन हौसला बढ़ा। यही हौसला तो उनका संकल्प है जो कुमाऊं में पशुबलि के अंत को निकल पड़ा। बृहस्पतिवार को नैनीताल निकलते वक्त एक भेंट में गब्बर ने यही कहा कि पशुओं के लिए आखिरी सांस तक लड़ूंगा।