फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

रहने दो चंदा की लोरी, पापा लांग ड्राइव पर चलो

Wed, 07 Nov 2012 01:15 PM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क।
विज्ञापन
विज्ञापन
कल्पना कीजिए रात के 10 बजे हैं। नौ महीने का एक बच्चा नींद से रो रहा है। बच्चे के पिता आते हैं, उसे उठाते हैं और तुंरत गाड़ी में बिठा कर घुमाने ले जाते हैं। तकरीबन आधे घंटे बाद पिता वापस लौटते हैं तो बच्चा गहरी नींद में सो चुका होता है। अब कल्पना से बाहर आइए और इस हकीकत का सामना कीजिए। अगर आप भी नए-नए अभिभावक बने हैं, तो बच्चे को सुलाने के लिए चल रहा यह नया ट्रेंड आपके भी काम आ सकता है। भारत में तो आज भी बड़े-बुजुर्ग बच्चों को सुलाने के लिए लोरी गाने की या झुला झुलाने की सलाह देते हैं। लेकिन विदेशों में मां-बाप हर परेशानी का हल हाईटेक तरीके से ढूंढते हैं। ऐसे में बच्चों को सुलाने की परेशानी का उपाय सामने आता है उन्हें दूर तक ड्राइविंग पर ले जाकर।
विज्ञापन


अब बेशक पूरी दुनिया में पेट्रोल के दाम पर हौ-हल्ला मचता रहे, लेकिन बच्चों की नींद के आगे पेट्रोल की बढ़ती कीमत भी टिक नहीं पाती है। लंदन की एक रिटेल फर्म मदरकेयर ने यह शोध करवाया है। इस शोध के मुताबिक नए जमाने के अभिभावक अपने बच्चे को सुलाने के लिए एक साल में औसतन 1,322 मील का सफर तय करते हैं।

शोध के मुताबिक एक पिता बच्चे के पहले साल में उसे रात को सुलाने के लिए 1,827 मील तक ड्राइव करते हैं। शोध के दौरान आधे से ज्यादा प्रतिभागी अभिभावकों ने यह माना कि वह अपने बच्चे को सुलाने के लिए सप्ताह में कम से कम एक बार अपनी कार से सैर करवाने ले जाते हैं। अमूमन एक सैर आधे घंटे से ज्यादा समय की होती है। शोध में यह भी सामने आया कि बच्चों को सुलाने के लिए ड्राइविंग के इस उपाय का इस्तेमाल ज्यादातर पिता ही करते हैं। आंकड़ों के मुताबिक बच्चों की मां शुरुआती 12 महीनों में सिर्फ 860 मील ही ड्राइव कर पाती हैं।
विज्ञापन


शोध के नतीजे बताते हैं कि बच्चों को सुलाने के लिए सबसे ज्यादा दूरी लंदन के अभिभावक तय करते हैं। इनका आंकड़ा 3000 मील प्रति वर्ष से भी ज्यादा दूरी को पार कर जाता है। अभिभावकों की मदद करने और इस सफर की दूरी को कम करने के लिए मदरकेयर ने लंदन की 17 महीने की एक बच्ची जारा काजीम का अध्ययन किया। जारा के जरिये बच्चों की औसत नींद के बारे में पता किया गया। इसमें सामने आया कि ड्राइव पर ले जाने के दौरान बच्चों को सोने का काफी बेहतर माहौल मिलता है, जिससे उन्हें जल्दी नींद भी आ जाती है। इस शोध को देखकर तो यही लगता है कि अब जल्द ही ‘नन्हीं परी सोने चली हवा धीरे आना...’। ‘चंदा मामा दूर के ...’। ‘आ जा री निंदिया प्यारी...’ जैसी कई लोरियों की आवाज कहीं गुम ही हो जाएगी।
विज्ञापन

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें