आज चालीस डिग्री तापमान पर हम त्राहि त्राहि करने लगते हैं। कल्पना कीजिए जब धरती का तापमान 40 नहीं 60 डिग्री से ज्यादा था। लगभग 25 करोड़ साल पहले हुई महाप्रलय के बाद धरती का तापमान इतना ज्यादा हो गया था कि यहां जीवन पनपना संभव नहीं था। बेहद हैरान करने वाले इस तथ्य का दावा वैज्ञानिकों ने एक शोध में किया है। जीवन के बिखरने की इस पहेली को सुलझाने में लंबे समय से वैज्ञानिक जुटे हुए हैं। करोड़ों साल पहले हुई उस महाप्रलय में सभी तरह के जीव जंतुओं का अस्तित्व खत्म हो गया था। वैज्ञानिकों के मुताबिक महाप्रलय के बाद हुए जलवायु परिवर्तन और ज्वालामुखी घटनाओं में 96 फीसदी जलीय जीव और भूमि पर रहने वाले 70 फीसदी जीव खत्म हो गए थे।
यूनिवर्सिटी ऑफ लीड्स में हुए इस वैज्ञानिक शोध के मुताबिक महाप्रलय जैसी विनाश लीलाओं के बाद आमतौर पर जीवन को फिर से पनपने में कई हजार सालों का वक्त लगता है। लेकिन पृथ्वी पर हुई उस महाप्रलय का असर इतना ज्यादा पड़ा कि धरती अगले पचास लाख साल तक डेड जोन बनी रही। इस दौरान सतह का तापमान 60 डिग्री और सागरों का तापमान 40 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया। वैज्ञानिकों के मुताबिक वैश्विक कॉर्बन चक्र के गड़बड़ाने के कारण इस तरह की स्थितियां पैदा हुईं।
शोध करने वाले प्रमुख वैज्ञानिक याडॉन्ग संग ने जानकारी दी कि, ग्लोबल वार्मिंग को अक्सर महाप्रलय से जोड़ कर देखा जाता रहा है, हमारे अध्ययन से पहली बार इस तथ्य का पता चला है कि असहनीय तापमान ने लाखों सालों तक भूमध्यवर्ती अक्षांश में जीवन को पनपने से रोके रखा। लंबे समय तक चलने वाली बेहद गर्म हवाओं के कारण उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में पेड़-पौधे नहीं पनप सके। सागरों में केवल फर्न, झुरमुट और घोंघे ही बचे रह गए। शोध कर्ताओं ने दक्षिणी चीन में मौजूद कुछ चट्टानों से जमा किए ईल जैसी मछली के अवशेषों का अध्ययन किया। ईल जैसी संरचना वाली इस मछली के पंद्रह हजार छोटे-छोटे दांतों से मिले डाटा के बाद इस रिसर्च रिपोर्ट को तैयार किया गया है। इन दांतों में मौजूद ऑक्सीजन के परमाणुओं के आधार पर गणना कर लाखों साल पहले के तापमान के स्तर की गणना की गई।