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जब बकरा बन गया 'जनरल', मदद की अनोखी दास्तां

Tue, 30 Oct 2012 10:34 AM IST
लैंसडौन।
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फौजी अहसान नहीं भूलते। 1919 के एंग्लो-अफगान युद्ध में मोर्चे पर रॉयल अंग्रेजी सेना का हिस्सा रही गढ़वाल राइफल की एक टुकड़ी ने अपने मददगार बकरे का अहसान उसे ‘जनरल’ का दर्जा देकर चुकाया था। बकरे को लैंसडौन भी लाया गया था।
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फरिश्ता बनकर आया था सामने
तीसरा एंग्लो-अफगान युद्ध कठिन हालात में हुआ था। इसमें अंग्रेजी फौज के लगभग 17 सौ लोग मारे गए थे। चित्राल (अफगानिस्तान सीमा) क्षेत्र में तैनाती के दौरान गढ़वाल राइफल्स की एक टुकड़ी भटक गई। फौजी भूख-प्यास से तड़प रहे थे। तभी झाड़ियों से एक बकरा रहमत का फरिश्ता बनकर सामने आया। बड़ी सींगें और दाढी़ वाले बकरे को पहले तो टुकड़ी ने मारना चाहा। फिर कुछ सोचकर उसके पीछे-पीछे चलने लगी। बकरे ने न सिर्फ टुकड़ी को राह दिखाई बल्कि वह एक ऐसी जमीन पर ले गया जहां बड़ी मात्रा में आलू दबे थे। उसे खाकर टुकड़ी ने जान बचाई। बकरे ने फौजियों को आगे की भी राह दिखाई।

कहीं भी जाने की थी आजादी
जनरल बकरे को लैंसडौन में पूरी आजादी थी। सैनिक बैरक में उसे एक कमरा दिया गया था। बाजार में जिस चीज को वह खाने लगता उसे कोई रोकता नहीं था। उसका बिल दुकानदार सेना को देते थे जहां से उसका भुगतान हो जाता था।
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किताबों-किस्सों में बकरा जनरल का जिक्र
बकरा जनरल का जिक्र इतिहासकार डॉ. रणवीर सिंह चौहान ने प्रसिद्ध पुस्तक ‘लैंसडौन सभ्यता और संस्कृति’ और साहित्यकार योगेश पांथरी ने अपनी पुस्तक ‘कालौडांडा से लैंसडौन’ में किया है। लैंसडौन में सबसे पहले बसे परिवारों में से एक के वर्तमान मुखिया रामदास गुप्ता और लैंसडौन के पुराने निवासी रमेश चंद्र शर्मा का कहना है कि जनरल बकरा को उन्होंने तो नहीं देखा। अलबत्ता, परिजन उसके बारे में बताते थे।
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