पढ़ाई लिखाई की कोई उम्र नहीं होती। अणां गांव की 82 साल की राधिका रावत ने पांचवीं की परीक्षा देकर ये तो साबित किया ही है। साथ ही उन लोगों को भी संदेश दिया है जो उम्र के इस पड़ाव में जीवन से उकता कर उदासी का बाना पहन लेते हैं।
वे साक्षर भारत कार्यक्रम के तहत कक्षा पांच की बुनियादी परीक्षा देने वाली गांव की ही नहीं शायद कुमाऊं की पहली बुजुर्ग महिला हैं। राधिका से प्रेरित होकर गांव के अन्य बुजुर्ग भी लोक शिक्षा केंद्र में पढ़ने जाने लगे हैं।
अणां गांव की राधिका रावत अपने मां-बाप की इकलौती बेटी थीं। सात साल की उम्र में उनके सिर से मां का साया उठने के बाद घर की जिम्मेदारियां आ गईं।
पिता ने ‘लड़की है’ कहकर उसे स्कूल भेजने की कोशिश नहीं की। सत्रह साल की उम्र में उनकी शादी हो गई। उनके पति चतुर सिंह कक्षा आठ पास थे। उनका दस साल पहले निधन हो गया।
राधिका के चार पुत्र- पुत्रवधु, एक लड़की, नाती और पौत्रों से भरा पूरा परिवार है। परिवार में सभी साक्षर हैं। श्रीमती रावत ने बताया कि नाती-पोते जब स्कूल से घर आते थे, तब उनसे ‘किताब में क्या लिखा है हमें बताओ...’ पूछते थे।
निरक्षर होने के कारण अपनी कमजोरी छिपाने के लिए बच्चों को कहानियां सुनाकर उनका ध्यान बांट देती थीं। गांव में जब चार माह पहले साक्षर भारत कार्यक्रम से जुडे़ लोगों ने साक्षरता जागरूकता रैली निकाली तो वे अपने को रैली में जाने से नहीं रोक पाईं और अगले दिन से पढ़ने-लिखने गांव के लोक शिक्षा केंद्र जाने लगीं।
प्रेरक रजनी बिष्ट और भगवती आर्या ने उन्हें पढ़ना-लिखना सिखाया। लोक शिक्षा केंद्र से घर लौटने पर उनके पुत्र सुंदर और सुरेश ने उन्हें पढ़ाई-लिखाई में मदद की।
आमां ने बताया कि उन्हें पांच साल से वृद्धावस्था पेंशन मिल रही है। पहले वह मनीऑर्डर फॉर्म पर अंगूठा लगाकर पेंशन प्राप्त करती थीं, लेकिन बाकायदा हस्ताक्षर कर वृद्धावस्था पेंशन लेती हैं।
वह शाम को टीवी में समाचार भी सुनती हैं। नव साक्षर राधिका ने बताया कि निरक्षरता घर, गांव और देश के विकास लिए घातक है।