महाकुंभ के सबसे अहम शाही स्नान पर्व मौनी अमावस्या से पहले बुधवार को खुद का पिंडदान करके तकरीबन डेढ़ हजार अवधूत साधु संन्यासी बन गए। पंचदशनाम जूना अखाड़ा ने इसकी पहल की। अखाड़े के विभिन्न आश्रमों में पंच संस्कार के बाद बने तकरीबन डेढ़ हजार अवधूतों को संगम की रेती पर संन्यास की दीक्षा दी गई।
परंपरानुसार जूना पीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि ने पहले उन्हें गंगा किनारे संन्यास के उद्देश्य सहित इसका अर्थ और इसकी अवधारणा की जानकारी दी। फिर अखाड़े की छावनी में आराध्य भगवान दत्तात्रेय के सामने पूरी रात हुए ‘विजयाहवन’ में उन्होंने नए संन्यासियों को मंत्र की दीक्षा दी। साथ ही संन्यास की मर्यादा और परंपरा के निर्वाह का संस्कार भी समझाया।
इससे पहले गंगा किनारे अखाड़े के मेला प्रभारी और सचिव श्रीमहंत विद्यानंद सरस्वती के निर्देशन में अवधूतों के नागा बनने की प्रक्रिया शुरू हुई। इसके तहत वस्त्र त्याग करके लंगोटी देने के बाद उनका मुंडन, स्नान कराया गया।
तीर्थ पुरोहित संतोष मिश्र और संजय बधेका की देखरेख में नई लंगोटी पहनाने के बाद उन्हें पलाश का दंड और कुल्हड़ का कमंडल देकर दंडी संन्यासी बनाया गया। इसी क्रम में जनेऊ पहनाकर पूरे शरीर पर भभूत लगाया गया। पूरे चौबीस घंटे तक नए संन्यासियों ने व्रत रखकर कठिन साधना की।
ऑस्ट्रेलिया का साधु भी शामिल
नागा बनने आए तकरीबन डेढ़ हजार अवधूतों में एक विदेशी भक्त भी शामिल रहा। पूरी निष्ठा और परंपरा के साथ इस ऑस्ट्रेलियाई अवधूत ने मुंडन से लेकर विजयाहवन तक सारे संस्कार पूरे किए।