कुंभ में भाइयों के बिछुड़ने की कहानी तो बहुत सुनी होगी लेकिन इस कुंभ में एक हठयोगी बीस साल बाद अपने भाइयों से मिलेंगे। बचपन में ही घर-बार त्याग चुके हठयोगी 33 साल से खड़े हुए हैं।
खड़े हुए सोते और खाते-पीते भी हैं। इससे पहले 31 साल तक मौन रहे। अन्न अब भी ग्रहण नहीं करते, सिर्फ फलाहारी हैं। खड़े-खड़े पैर में घाव हो गया है। डॉक्टरों ने आराम करने की सलाह दी है पर योगी के हठ के आगे डॉक्टरों की भी नहीं चली।
तपोनिधि आनंद अखाड़े के श्रीमहंत तपन भारती 65 साल के हैं। वह बंगाल से आए हैं। बचपन में मां से प्रेरणा पाकर वह संन्यासी बन गए और घर-बार त्याग दिया। अखाड़े के संत उन्हें सिद्ध पुरुष बताते हैं।
वैसे तो पूरे मेला क्षेत्र में ऐसे तमाम संत दिख जाएंगे, जो कई साल से पैर पर खड़े हैं या अपने हाथ उठाए हुए हैं लेकिन श्री महंत तपन भारती कुछ अलग हैं। वह अखाड़े के भीतर छोटे से एक शिविर में रहते हैं। सबके सामने नहीं आते। खड़े होकर विश्राम करने या सोने के लिए लकड़ी का एक ऐंगल बनवा रखा है। उसी पर अपने दोनों हाथ टिकाकर सो जाते हैं।
श्रीमहंत बताते हैं कि वे सात भाई है, जिनमें वह तीसरे नंबर के हैं। बीस साल से भाइयों से नहीं मिले हैं। उनके कुछ भाई नौकरी करते हैं तो कुछ का अपना व्यवसाय है। उनके पास संदेश आया है कि इनमें से दो भाई कुंभ मेले में आ रहे हैं। श्रीमहंत 20 साल बाद अपने भाइयों से मिलेंगे।