रंगीली के पास आवत ही गोपाल के ग्वाल बाल ब्रजलाल की याद करवे लग जामै। बरसाने की हुरियारिन के लट्ठन ते बचवे कौ इंतजाम बिनके ही पास है।
ब्रजलाल की ढालन पै ही हुरियारे लट्ठन की चोट लैमै और बिनकौ बाल ऊ बांकौ नाय होय। याकै लै ब्रज लाल बड़ी मशक्कत करतै। डेढ़ महीना पहले ते वह ढाल बनावे मै जुट गए हैं। नंदगांव मै ढाल बनावे वारे वे इकलौते ही हैं। पिछले 45 साल ते ब्रजलाल अपने नंदलाल के सखन की रक्षा कर रह्ये।
ढाल बनाने वाले कारीगर 60 वर्षीय ब्रजलाल ने बताया कि जा काम मै ज्यादा बचत नाय होय पर मन ए शांति मिलै। यह तौ मेरौ सौभाग्य है कि अपने लाला की सेवा करवे कौ मौकौ मिलौ है। पहले मेरे भैया या काम ऐ करते पर अब मै अकेलौ ही लगौ रहूं।
राजस्थान से आती है ऊंट की खाल
ढाल बनाने के लिए जयपुर, अलवर आदि स्थानों से ऊंट की खाल खरीदकर यहां लाई जाती है। एक ढाल बनाने में तीन से चार दिन लग जाते हैं।
चमडे़ को गोलाई में काटकर उस पर दो और परतें चढ़ाई जाती हैं। इन परतों की मोटे और मजबूत धागों से सिलाई की जाती है। जगह-जगह छोटी कीलें भी लगाई जाती हैं। ढाल बनाने का काम बहुत ही मेहनत भरा है।
महंगी हुई ढाल
लट्ठामार होली पर भी महंगाई की मार पड़ी है। ढाल पर करीब 12-13 प्रतिशत महंगाई पड़ी है। पिछले साल 1400 में मिलने वाली ढाल की कीमत अब 1700 रुपये है। 1700-2000 रुपये तक की ढालें उपलब्ध है।
दशकों पहली ढाल अब कहां
नंदबाबा मंदिर के सेवायत एवं पूर्व प्रवक्ता विजेंद्र गोस्वामी ने बताया कि पहले जैसी ढाल देखने को भी नहीं मिलती। पहले ढालों में 10-15 किलो तक का वजन हुआ करता था।
इसके नीचे बैठा हुरियारा पूरी तरह सुरक्षित हो जाता था। अब खानपान में हुई कमी के चलते भारी ढालों का इस्तेमाल समाप्त हो गया है।
वर्तमान में ढालों का वजन 5 से सात किलोग्राम ही रह गया है। भारी ढालों को संभालने का भी अभ्यास किया जाता था।
पुरानी ढाल को चाहिए 500 ग्राम तेल
बसंत पंचमी लगते ही ढालों को तेल लगाकर धूप में सुखाना प्रारंभ हो जाता है। पुरानी ढाल को करीब पांच सौ ग्राम तेल तक पिलाया जाता है। छोटे बच्चों के लिए छोटी और हल्की ढालें विशेष रूप से तैयार कराई जाती हैं।
(फोटो- नंदगांव में लठामार होली के लिए ढाल तैयार करते कारीगर ब्रजलाल।)