गंगा और उसकी रेती में ऐसा कौन सा अमृत है कि करोड़ों लोगों के मेले में कभी महामारी नहीं फैली। कल्पवासियों के शरीर में आखिर ऐसे कौन से बैक्टीरिया प्रवेश करते हैं, जो शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं। वैज्ञानिकों ने इस बार कुंभ में एक शोध के माध्यम से इन सभी सवालों का जवाब खोजने की कवायद भी शुरू कर दी है।
शोध कई संस्थाएं एक साथ मिलकर कर रही हैं। इनमें नेशनल बोटनिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट, इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल सांइसेज बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी, मोती लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज, सेंटर फॉर सोशल फोरेस्ट्री ऐंड ईको रिहेबिलिटेशन और इन-हाउस आरएंडडी डीएसआईआर के वैज्ञानिक शामिल हैं।
काशी हिंदू विश्व विद्यालय के प्रो. यामिनी भूषण त्रिपाठी और इन-हाउस आरऐंडडी डीएसआईआर के निदेशक डॉ. वाचस्पति त्रिपाठी ने बताया कि सभी मुख्य स्नान पर्व वाले दिन, एक पहले और एक दिन बाद रेत एवं गंगाजल के 13 हजार नमूने लिए जाएंगे। कल्पवासियों के लिए एक स्वास्थ्य प्रश्नोत्तरी भी तैयार की गई है। यह प्रश्नोत्तरी तीन हजार कल्पवासियों से भरवाई जाएगी। कम से कम एक हजार कल्पवासियों के खून के नमूने लिए जाएंगे। मोती लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज में सभी नमूनों की जांच कराई जाएगी।
कुंभ मेला समाप्त होने के बाद प्रश्नोत्तरी में दर्ज कल्पवासियों के फोन नंबर पर उनसे संपर्क किया जाएगा। शोध के परिणाम सामने आने में तीन से छह माह का समय लग जाएगा। जांच के दौरान यह भी देखा जाएगा कि गंगा स्नान या कल्पवास के दौरान कल्पवासियों के शरीर में किन नए जीवाणुओं ने प्रवेश किया। ये जीवाणु शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में किस तरह सहायक हैं या कितना नुकसान पहुंचा सकते हैं। इस रिसर्च को ‘कुंभ स्नान व कल्पवास की जीवनशैली का वैज्ञानिक प्रमाणीकरण’ नाम दिया गया है।