महत्मा बुद्घ और महावीर जैन की तरह कई ऐसे व्यक्ति हुए हैं जिन्होंने मोह माया के बंधन को तोड़कर संन्यास धारण किया।
ज्योतिषशास्त्र में कुछ ऐसे योगों का जिक्र किया गया है जो कुण्डली में मौजूद होने पर व्यक्ति काम वासना, धन-दौलत और सुख सुविधाओं की चाहत से दूर रहता है। ऐसे व्यक्ति को संसारिकता की बजाय संन्यास पसंद होता है।
तब व्यक्ति संसारिकता से दूर रहने लगता है
ज्योतिषशास्त्र के अनुसार अगर किसी व्यक्ति की कुण्डली में एक ही घर में चार या इससे अधिक ग्रह बैठे हों। इसके साथ सभी ग्रह बलवान भी हैं तो व्यक्ति संसारिकता से दूर रहने लगता है।
यह अपने जीवन को संतुलित नहीं रख पाते हैं। इनके मन में सांसारिकता का लगाव कम होता है। अनुकूल परिस्थिति मिलने पर घर परिवार छोड़कर संन्यासी भी बन सकते हैं।
तब शनि और चन्द्र बनाते हैं संन्यासी
जन्मपत्री में शनि से तीसरे, सातवें या दसवें स्थान पर कुण्डली पहले घर में स्थित राशि का स्वामी यानी लग्नेश मौजूद हो तो व्यक्ति में संन्यास की भावना आती है। इसके साथ चन्द्रमा बलवान नहीं हो तो व्यक्ति दुनियादारी से विमुख रहने वाला होता है।
ग्रह के अनुसार संन्यासी के प्रकार
ज्योतिषग्रंथ बृहज्जातक के अनुसार चार ग्रहों में अगर गुरु अधिक बलवान होता है तो व्यक्ति संन्यासी बन जाता है। चन्द्रमा के बलवान होने पर व्यक्ति कपाली होता है। सूर्य बलवान होने पर व्यक्ति कंद, मूल और फलों का सेवन करने वाला तपस्वी बन जाता है।