तमाम पुत्रों को अपने पिता का चेला बनते देखा या सुना होगा लेकिन कुंभ में एक संत ऐसे हैं, जिन्होंने अपने पिता को ही चेला बना लिया था। तनोनिधि आनंद अखाड़े के श्रीश्री 108 श्री महंत सभापति ओंकारनाथ भारती की कहानी न सिर्फ रोचक बल्कि चौंकाने वाली भी है।
उन्होंने अपने कई शिष्यों के कान में गुरु मंत्र फूंका और उनमें उनके पिता भी शामिल हैं। गुरु मंत्र देकर पिता को जीवन भर के लिए संन्यासी बना दिया। भले ही उनके पिता अब इस दुनिया में न हों लेकिन हैरान कर देने वाली ओंकारनाथ भारती की यह कहानी उनके भक्तों के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं।
इलाहाबाद में जसरा के रहने वाले महंत सभापति ओंकारनाथ भारती दस साल की आयु में घर-बार त्याग कर संन्यासी बन बैठे थे। उनके एक बड़े भाई भी थे जबकि पिता जमुना प्रसाद त्रिपाठी रेलवे में नौकरी करते थे। बड़े भाई की कोई संतान नहीं थी।
रिटायरमेंट के बाद जमुना प्रसाद संन्यासी बन चुके अपने पुत्र को घर वापस लेने के लिए पहुंचे लेकिन ओंकारनाथ भारती की तपस्या एवं हट के आगे उन्हें नतमस्तक होना पड़ा। उल्टे जमुना प्रसाद त्रिपाठी खुद संन्यास ग्रहण कर जमुना भारती बन गए। जमुना प्रसाद ने 105 वर्ष की आयु में राजस्थान में अपना शरीर त्याग दिया। 75 साल के ओंकारनाथ भारती अब तपोनिधि आनंद अखाड़े में ही रहते हैं।
ओंकारनाथ के शिष्य बाल भारती बताते हैं कि पूरे विधि-विधान से ही किसी को चेला बनाया जाता है। शिष्य को भगवा पहनाने वाले भगवा गुरु, रुद्राक्ष की माला पहनाने वाले रुद्राक्ष गुरु, लंगोटी पहनाने वाले लंगोट गुरु, भस्म लगाने वाले भस्मी गुरु कहलाते हैं जबकि चोटी काटने और कान में गुप्त मंत्र फूंकने वाला चोटी गुरु या मुख्य गुरु होता है। ओंकारनाथ भारती ने अपने पिता की चोटी काटी थी और उनके कान में गुप्त मंत्र फूंका था।