पुर्तगाल के कोबिडा इरिया में 13 अक्टूबर 1917 को तीन बच्चों ने पेड़ पर लटकते एक प्रकाश को देखा। प्रकाश के बीच में एक चंद्र वदनी देवी मुस्करा रही थी। लड़के डरने लगे तो देवी ने समझाया। यह बात सब जगह फैला गई। दूसरे दिन आसपास के करीब सत्तर हजार लोग देवी के दर्शन करन इकट्ठे हुए। युवती के दर्शन तो न हुए पर उस समय एक अद्भुत प्रकाशपुंज सभी ने देखा।
लगा कि हल्की वर्षा हो रही है और कपड़े उसमें भीग रहे है। इतने में प्रकाश के गोले ने एक गरम लहर का चक्कर लगाया और देखते देखते सबके कपड़ों से भाप उठने लगी। इस घटना से पुर्तगाल में तहलका मच गया। वहां के मशहूर अखबार मार्सेक्यूलों ने इस घटना का आंखों देखा विवरण छापा और उसे ‘सूर्य का नृत्य’ नाम दिया।
कुछ जानकारों ने तुक ठिठाई की कि सत्तर हजार व्यक्ति एक ही कल्पना से आबद्ध थे। फलतः उन्हें वैसा ही स्वरूप प्रतीत हुआ। जिनकी समक्ष में यह तुक नहीं आई, उनने सीधे-सीधे शब्दों में इसे दैवी चमत्कार कहते हुए, प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति पर शांति का बोधक बताया।
विद्वतजन ऐसी घटनाओं का अपने ढंग का अर्थ लगाते हैं। पर यह एक प्रश्न तो बना ही रहता है कि सत्तर हजार व्यक्तियों को एक ही तरह का दृश्य एक ही समय में कैसे दीखा?