कुंभ के इतिहास में पहली बार सोमवार को सभी संप्रदायों के संत एक मंच पर इकट्ठा हुए। हिंदू, बौद्ध, सिख और जैन संप्रदाय के संतों के बीच बंद कमरे में डेढ़ घंटे तक चली बैठक के दौरान नरेंद्र मोदी के पक्ष में संतों का समर्थन जुटाने की कोशिश की गई।
साथ ही राम जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण के मसले पर भी चर्चा हुई। हालांकि बैठक के बाद संतों ने आधिकारिक रूप से जो बयान जारी किया, उसमें दोनों ही मुद्दे नदारद दिखे। बैठक में पारित प्रस्ताव के बारे में बाद में सार्वजनिक रूप से घोषणा भी की गई लेकिन पूरे प्रस्ताव में ऐसा कोई मुद्दा नहीं था, जिसे लेकर गोपनीय बैठक करने की जरूरत थी।
मेला क्षेत्र के सेक्टर-12 में स्थित श्रीगुरू कर्ष्णि आश्रम में आयोजित बैठक में मौजूद सूत्रों ने बताया गया कि मोदी के नाम पर सहमति बनाने की कोशिश की गई है। इस बैठक को सात फरवरी को आयोजित विश्व हिंदू परिषद की बैठक के रिहर्सल के रूप में भी देखा जा रहा है, जिसमें भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह शामिल होंगे।
सूत्रों के मुताबिक आठ फरवरी को इसी आश्रम में संतों की एक और बैठक होगी और उसमें कोई बड़ी घोषणा होने की उम्मीद है। सोमवार को हुई बैठक में विहिप के अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक सिंघल के साथ शंकराचार्य स्वामी जयंत सरस्वती, शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती, दलाई लामा के शिष्य रिन पौंचे, योग गुरु बाबा रामदेव, निर्मल आखाड़े के स्वामी ज्ञानदेव सिंह, जैन संप्रदाय के रवींद्राचार्य, महामंडलेश्वर आचार्य गोविंद देव गिरि, स्वामी चिदानंद मुनि सहित तमाम बड़े संत मौजूद रहे।लेकिन बंद कमरे में हुई बैठक से बाहर आने के बाद जब संतों से मोदी और रामजन्म भूमि के मसले पर सवाल किया गया तो सभी ने कहा कि बैठक में राजनीति से संबंधित किसी मसले पर चर्चा नहीं हुई।
हालांकि बैठक में शामिल होने से पहले शंकराचार्य स्वामी जयंत सरस्वती ने मोदी के बारे में कहा कि वह सर्वधर्म समभाव वाले नेता हैं। बैठक में गोपनीय क्या था, इसपर भी किसी संत ने कोई टिप्पणी नहीं की। संतों के मुताबिक बैठक में सभी संप्रदाय के संत इकट्ठा हुए और प्रस्ताव पारित किया कि आर्थिक विकास के साथ देश का धार्मिक एवं सांस्कृतिक विकास भी होना चाहिए। इस बैठक में उन सभी संप्रदायों के संतों को शामिल किया गया, जो भारत की मिट्टी से पैदा हुए।
संतों ने बताया कि जनसंख्या असंतुलन पर भी चर्चा हुई। साथ ही विधर्मी एवं विदेशी आक्रमण से देश को सुरक्षित रखने का संकल्प लिया गया। महंगाई और धर्मांतरण के मुद्दे पर विचार-विमर्श हुआ। भगवा आतंकवाद के मसले पर संतों ने अपना विरोध दर्ज कराया। नरेंद्र मोदी के मामले में विहिप के अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक सिंघल का कहना था कि विहिप मोदी को प्रधानमंत्री कैसे बनवा सकती है। उन्हें तो मीडिया के माध्यम से मालूम हुआ कि मोदी कुंभ में आ रहे हैं।
भावुक हो उठे दलाई लामा के शिष्य
दलाई लामा के कुंभ मेला में न आने से उनके शिष्य रिन पौंचे काफी भावुक दिखे। श्रीकर्ष्णि आश्रम में संत सम्मेलन के दौरान उन्होंने कहा कि दलाई लामा को यहां आना था लेकिन किन्हीं कारणों से नहीं आ सके। उनका शरीर भले ही यहां न हो लेकिन वह अंतरयामी हैं और उनका आशीर्वाद हमारे साथ है। उन्होंने कहा कि कुंभ के इतिहास में बौद्ध संप्रदाय के लोगों को पहली बार आमंत्रित किया गया। यह महत्वपूर्ण कदम है। इससे बौद्ध समाज के लोग अन्य संप्रदायों के करीब आएंगे।