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धूनी नहीं रमाते श्री शंभु पंच अग्नि अखाड़े के साधु-संत

Tue, 05 Feb 2013 08:46 AM IST
विजय सक्सेना/महाकुंभ नगर
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शैव संप्रदाय के जूना, आह्वान सहित अन्य अखाड़ों की अपेक्षा श्री शंभु पंच अग्नि अखाड़े की परंपरा बिलकुल अलग है। शैव संप्रदाय का होते हुए भी इस अखाड़े की तमाम चीजें नागा सन्यासियों से तनिक भी मेल नहीं खाती।
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पहले तो यहां नागा नहीं ब्रह्मचारी संत बनाए जाते हैं। दूसरे इस अखाड़े के ब्रह्मचारी संत धूनी नहीं रमाते, न किसी तरह का मादक पदार्थ ही नहीं ग्रहण करते। अग्नि अखाड़े की आराध्य देव माता गायत्री हैं।

अग्नि अखाड़े में ब्रह्मचारी संतों की संख्या सीमित है। यहां हर कोई संत नहीं हो सकता। उसका ब्राह्मण होना आवश्यक है। ब्रह्मचारी बनाने की लंबी प्रक्रिया के तहत संतों के सिर पर सिखा होती है। साथ ही जनेऊ धारण करते हैं।
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ब्रह्मचारी को गायत्री मंत्र की दीक्षा की जाती है। खास यह कि इस अखाड़े के ज्यादातर ब्रह्मचारी संत भंडारा या घरों में तैयार भोजन ग्रहण नहीं करते। अग्नि अखाड़े के सचिव श्रीमहंत स्वामी कैलाशानंद जी का कहना है कि ब्रह्मचारी संत स्वपाकी होने के कारण स्वयं भोजन तैयार कर ग्रहण करते हैं।

ब्रह्मचारी संत की पहचान सिर पर सिखा और बदन पर जनेऊ से होती है। ब्रह्मचारी संत 16 माला गायत्री जप करते हैं। स्वामी जी ने बताया कि अग्नि अखाड़े में तकरीबन चार सौ ब्रह्मचारी संत हैं और सभापति स्वामी गोपालानंद ‘बापूजी’ के सानिध्य में कार्य करते हैं। उन्होंने बताया कि अग्नि अखाड़े में एक लाख विद्यार्थी भी हैं, जो उनकी देखरेख में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं और ज्यादातर को वेद कंठस्थ है।
 
इलाहाबाद में भी खुलेगी अग्नि की शाखा
श्री शंभू पंच अग्नि अखाड़ा की शाखा जल्द ही इलाहाबाद में भी खुलेगी। अखाड़े के सचिव श्रीमहंत स्वामी कैलाशानंद के नेतृत्व में इसके लिए तैयारी तेजी से शुरू हो गई है। उम्मीद की जा रही है कि महाकुंभ में इलाहाबाद में शाखा खोलने की घोषणा हो जाए। स्वामीजी का कहना है कि शाखा में गरीबों को भोजन, वेद की शिक्षा के साथ सनातन परंपरा का पालन किया जाएगा।

14 को महामंडलेश्वर बनेंगे स्वामी कैलाशानंद
स्वामी कैलाशानंद श्री शंभू पंच अग्नि अखाड़े के नए महामंडलेश्वर होंगे। इसके लिए उनका पट्टाभिषेक 14 फरवरी को किया जाएगा। उनका कहना है कि महामंडलेश्वर पद बापूजी की अनुमति से ग्रहण कर रहे हैं। महज 18 वर्ष की आयु में श्रीमहंत बनने वाले स्वामी कैलाशानंद को 2003 में बापूजी ने दीक्षा दिलाई। इसके बाद नासिक कुंभ में वरिष्ठ पदाधिकारी बना दिया गया।
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