महागठबंधन में रुतबा नहीं, अपने कार्यकर्ताओं को टिकट नहीं। बिहार में सीटों के बंटवारे और टिकट बंटने के बाद एक लाइन में कांग्रेस की कहानी यही है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को एक तरह से तेजस्वी के सामने सरेंडर करना पड़ा। तेजस्वी यादव को महागठबंधन का मुख्यमंत्री प्रत्याशी आखिरकार घोषित करना पड़ा। मुकेश सहनी डिप्टी सीएम होंगे और कांग्रेस का कोई डिप्टी सीएम नहीं रहेगा। वहीं बिहार में कांग्रेस के निशान पर जिस तरह से बाहरियों को टिकट बांटे गए, उससे बिहार संगठन में बवाल हो गया।
प्रत्याशी चयन में कांग्रेस ने जिस 'नई रणनीति' की बात कही थी वह टिकट वितरण के बाद "गैरों पर करम और अपनों पर सितम" के रूप में उभर कर आई है। इस बाबत एक रिपोर्ट भी कांग्रेस आलाकमान को भेजी गई है। इसका लब्बोलुआब है कि “जो कल तक शाखा में झंडा उठाते थे,आज कांग्रेस का टिकट उठा रहे हैं।” बवाल का ही नतीजा है कि कांग्रेस के प्रभारी कृष्णा अल्लावरू को भारतीय युवा कांग्रेस के प्रभारी पद से हटा कर कार्यकर्ताओं की नाराजगी दूर करने की कोशिश जरूर की गई है। एक तरह से यह संदेश देने का प्रयास है कि आलाकमान उनकी सुन रहा है, समय पर कार्रवाई की जाएगी।
कांग्रेस के प्रत्याशियों की सूची में बाहरी चेहरों खासकर संघ-भाजपा के पुराने सहयोगियों की भरमार ने देश के सबसे पुराने दल में बगावत के सुर पैदा कर दिए हैं। लगभग एक दर्जन ऐसे उम्मीदवार हैं,जिनका राजनीतिक सफर आरएसएस शाखाओं या भाजपा रैलियों या फिर उसके सहयोगी दलों से गुजरा है। ये चेहरे छह महीने से कम समय पहले ही कांग्रेस में शामिल हुए और अब पार्टी का टिकट थामे चुनावी रिंग में उतरने को तैयार हैं। वहीं कांग्रेस के रिंग में पार्टी के वफादारों ने ही मुक्केबाजी के लिए हाथों में ग्लब्स चढ़ा लिए हैं। मतलब ये कि एनडीए से लड़ने से पहले महागठबंधन और उससे भी ज्यादा कांग्रेस को अपने वफादारों से ही लड़ना पड़ेगा।
महागठबंधन में तेजस्वी यादव को सीएम पद का दावा और मुकेश सहनी को डिप्टी का नाम तो तय हो गया है,लेकिन कांग्रेस का यह 'बाहरी भर्ती अभियान' पार्टी को तोड़ रहा है। खास बात है कि कांग्रेस नेतृत्व इसे "सर्वसमावेशी विस्तार" बताने में जुटा है, लेकिन बिहार कांग्रेस के नेता इसे "अवसरवाद की राजनीति" बताते हुए सदाकत आश्रम में कांग्रेस बचाओ का नारा बुलंद कर उपवास कर रहे हैं। स्थानीय रिपोर्ट्स और सोशल मीडिया पोस्ट्स से साफ है कि इन बाहरी उम्मीदवारों का अतीत भाजपा, जद(यू), लोजपा या एआईएमआईएम से गहराई से जुड़ा रहा।
इस टिकट वितरण के खिलाफ पटना के सदाकत आश्रम में कांग्रेसी धरने पर बैठ गए हैं। वे हाथों में तख्ती लिए हैं कि -वोट चोर, गद्दी छोड़- और इसके साथ ही -बिहार कांग्रेस बचाओ- का नारा बुलंद कर रहे हैं। इस स्थिति पर कांग्रेस के वरिष्ठ सूत्रों का कहना है कि "कार्यकर्ताओं की नाराजगी सिर आंखों पर, लेकिन हम असर वाले चेहरों को टिकट दे रहे हैं। कमजोर इलाकों में लोकल प्रभाव वाले नेताओं को लाना मजबूरी है, भले उनका बैकग्राउंड संघ-भाजपा का हो। करीब एक दर्जन सीटें ऐसी हैं, जिनमें भाजपा-संघ की पृष्ठभूमि वाले नेताओं के साथ-साथ गैर कांग्रेसियों को तरजीह दी गई है।
नौतनः संघ शाखा से कांग्रेस टिकट तक
इस कड़ी में सबसे चर्चित नाम है पश्चिम चंपारण की नौतन सीट से कांग्रेस प्रत्याशी अमित गिरी का। स्थानीय रिपोर्टों और सोशल मीडिया पोस्टों से पता चलता है कि अमित गिरी का लम्बा रिश्ता संघ की शाखाओं से रहा है। वे भाजपा सांसद डॉ संजय जायसवाल के करीबी माने जाते हैं और अक्सर भाजपा कार्यक्रमों में मौजूद रहते थे। उनके सोशल मीडिया अकाउंट पर मोदी सरकार की योजनाओं की तारीफ़ें और राहुल गांधी पर तंज़ भरे पोस्ट अब भी देखे जा सकते हैं।
नालंदा: भाजपा के मंच से कांग्रेस के मंच तक
हर्नौत: लोजपा से कांग्रेस तक
हर्नौत विधानसभा से अरुण कुमार बिंद को कांग्रेस प्रत्याशी बनाया गया है। वे कुछ दिन पहले तक लोजपा (चिराग पासवान गुट) के सक्रिय सदस्य थे। रैलियों में उनकी तस्वीरें अब भी लोजपा के झंडे और नेताओं के साथ मौजूद हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि टिकट घोषणा से ठीक पहले उनकी कांग्रेस में “औपचारिक एंट्री” हुई। मतलब एक तरफ लोजपा का झंडा समेटा और दूसरी तरफ कांग्रेस का झंडा उठा लिया। कांग्रेसियों ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि “हर्नौत में पार्टी नहीं, सिर्फ़ झंडा बदला है।”
ऐसे ही कुछ और नामों पर आईये तो
इस टिकट वितरण पर कांग्रेस के नेताओं का शिकवा है कि "हम कांग्रेस में इसलिए आए थे कि भाजपा की राजनीति से अलग खड़े रहें, लेकिन अब वही लोग हमारे नेता बन गए हैं।" इस नाराजगी को देखते हुए फिलहाल कार्यकर्ताओं का गुस्सा शांत करने के लिए बिहार के प्रभारी कृष्णा अल्लावरू को इंडियन यूथ कांग्रेस के प्रभारी पद से हटाना पड़ा है। हालांकि, बीच चुनाव में बिहार से नहीं हटा सकते, यह भी लोगों को समझा दिया गया है।
भाजपा-जदयू ने भी दलबदलुओं को मिले टिकट
बीजेपी ने भभुआ से भरत बिंद को टिकट दिया है। बिंद 2020 में राजद के टिकट पर यहां से जीते थे। चुनाव से पहले भाजपा का दामन थामा और दलबदल का इनाम भी उन्हें मिल गया। इसी तरह 2020 में मोहनिया सीट से राजद के टिकट पर जीतीं संगीता कुमारी को भी भाजपा ने पाला बदलने का इनाम दिया है। उन्हें मोहनिया से उम्मीदवार घोषित किया गया है।
चेनारी से कांग्रेस विधायक मुरारी गौतम को 2024 के बहुमत परीक्षण के दौरान पाला बदलने का इनाम टिकट के रूप में मिला है। गौतम चेनारी से लोजपा (आर) के टिकट पर मैदान में हैं। राजद के विधायक रहे छोटे लाल राय को जदयू ने परसा से उम्मीदवार बनाया है। इसी तरह राजद विधायक नीलम देवी के पति और बाहुबली अनंत सिंह इस बार जदयू के उम्मीदवार बनाए गए हैं।
नीलम देवी ने भी 2024 के बहुमत परीक्षण के दौरान पार्टी लाइन के खिलाफ जाकर नीतीश का समर्थन किया था। इसी तरह 2020 में शिवहर सीट से राजद के टिकट पर जीते चेतन आनंद इस बार नबीनगर सीट से जदयू के उम्मीदावर हैं। चेतन भी उन राजद विधायकों में शामिल थे जिन्होंने 2024 के बहुमत परीक्षण के दौरान पार्टी लाइन के खिलाफ जाकर नीतीश का समर्थन किया था। जदयू से राजद में गए और फिर जदयू में आए श्याम रजक को पार्टी ने फुलवारी शरीफ से अपना उम्मीदवार बनाया है। 2020 में मटिहानी से लोजपा के टिकट पर जीते राज कुमार सिंह इस बार यहां से जदयू उम्मीदवार हैं।
जनसुराज भी पीछे नहीं
प्रशांत किशोर की पार्टी जनसुराज में भी कई उम्मीदवार ऐसे है जो कुछ समय पहले तक अलग-अलग दलों में रहे हैं या उनके परिवार की अलग-अलग दलों में लंबी राजनीतिक विरासत रही है। जैसे जदयू अध्यक्ष फिर भाजपा से जनसुराज में आए आरसीपी सिंह की बेटी लता सिंह को पार्टी ने अस्थावां से उम्मीदवार बनाया है। इसी तरह खगड़िया से जनसुराज की उम्मीदवार जयंती पटेल जदयू में रह चुकी हैं। नबीनगर से जन सुराज की उम्मीदवार अर्चना चंद्र यादव इसी साल भाजपा से जन सुराज में आईं। गोह से सीताराम दुखारी जदयू से, करगहर सीट से प्रत्याशी बनाए गए रितेश पांडेय भाजपा से जन सुराज में आए हैं। पूर्व मंत्री लालमुनि चौबे के बेटे हेमंत चौबे चैनपुर से उम्मीदवार बनाए गए हैं। इस लिस्ट में कई और नाम भी शामिल हैं।