टेरर फंडिंग में एनआईए के शिकंजे के बाद अलग-थलग पड़े अलगाववादियों को 35 ए का नया मुद्दा मिल गया है। अलगाववादियों का संयुक्त मोर्चा कश्मीर के विशेष दर्जे और स्टेट सब्जेक्ट से छेड़छाड़ का भय पैदा कर हिंसा भड़काने की साजिश रच रहा है। मस्जिद कमेटियों को सक्रिय किया गया है। मस्जिदों से एकजुट होकर बंद, हड़ताल और प्रदर्शन की अपील की जा रही है। स्कूलों और कालेजों के छात्रों को भड़काकर फिर से पत्थरबाजी का दौर शुरू करने की कवायद तेज है। सुरक्षा एजेंसियों ने केंद्रीय गृह मंत्रालय को इस आशय की रिपोर्ट भेजी है। केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने राज्यपाल एनएन वोहरा से बातचीत कर हालात पर रिपोर्ट ली है।
सेना और सुरक्षा बलों ने कश्मीर में पिछले दिनों ऑपरेशन आल आउट के तहत करीब 125 से अधिक आतंकियों को ढेर किया है। इस कारण हिजबुल मुजाहिदीन, लश्कर-ए-तैयबा और अल कायदा के जाकिर मूसा गुट के आतंकियों में खौफ है। आतंकी संगठनों के ओवर ग्राउंड वर्कर्स भी अलगाववादियों की मुहिम में शामिल हो गए हैं। अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी, मीरवाइज उमर फारूक और यासीन मलिक ने शनिवार से प्रदर्शनों की शुरुआत का एलान किया है। सुरक्षा एजेंसियों को इनपुट मिले हैं कि हड़ताल के क्रम में पुलिस बल और सीआरपीएफ को उकसाने के लिए पत्थरबाजी शुरू हो सकती है। सुरक्षा बलों की कार्रवाई में कोई घटना होने पर उसकी आड़ में पूरी घाटी को अशांत करने की साजिश रची गई है। साजिश के मद्देनजर अलर्ट जारी कर अलगाववादियों की गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है।
मंत्रियों और विधायकों पर हो सकते हैं हमले
सुरक्षा एजेंसियों को मिले इनपुट के अनुसार उपद्रवी मंत्रियों, विधायकों और पीडीपी नेताओं पर हमले कर सकते हैं। अलगाववादियों और उपद्रवियों ने अवाम में यह प्रचार शुरू किया है कि सियासी दल खासकर पीडीपी कश्मीर के विशेष दर्जे को समाप्त करने की कोशिशों में आरएसएस के एजेंडे को लागू कर रही है। पीडीपी नेताओं के खिलाफ आक्रोश भड़काने की साजिश चल रही है। इस कारण पीडीपी के ग्रामीण नेताओं पर खतरा बढ़ा है। बुधवार को पुलवामा में हमले की आशंका के कारण मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती को अपना दौरा तक रद्द करना पड़ा।
महबूबा ने इस्तीफे की धमकी से बनाया दबाव
मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने भी 35 ए को हटाने की स्थिति में इस्तीफे के संकेत दे दिए हैं। बदलते सियासी घटनाक्रम में इस मुद्दे पर महबूबा की पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला से बातचीत को अहम माना जा रहा है। मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में है। महबूबा सरकार ने इस मुद्दे पर रियासत का पक्ष रखने के लिए एडवोकेट जनरल के अलावा सुप्रसिद्ध कानूनविद फली नरीमन को भी पैरवी के लिए रखा है। केंद्र सरकार ने इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष नहीं रखा। इस चुप्पी को 35 ए हटाने पर केंद्र की सहमति के रूप में पारिभाषित करते हुए नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी एकजुट संघर्ष के संकेत दे रही है। सीपीएम और अन्य छोटे दल भी इस मुहिम में शामिल हो रहे हैं।
क्या है संविधान का 35 ए
35 ए संविधान के एनेक्सर में शामिल है। 14 मई, 1954 को तत्कालीन राष्ट्रपति डा. राजेंद्र प्रसाद के आदेश से संविधान में इस अनुच्छेद को शामिल कर लिया गया। इसके लिए संसद की मंजूरी नहीं ली गई। अनुच्छेद 35 ए से जम्मू कश्मीर सरकार को स्टेट सब्जेक्ट तय करने का अधिकार हासिल हुआ है। इसके तहत रियासत के मूल निवासी के अलावा दूसरे राज्यों के लोगों को यहां जमीन खरीदने और नौकरियां हासिल करने का अधिकार नहीं है। अलगाववादी और नेशनल कांफ्रेंस नेता फारूक अब्दुल्ला इस अनुच्छेद को महाराजा हरि सिंह के निर्णय से जोड़ते हुए कश्मीर की डेमोग्राफी के लिए जरूरी बता रहे हैं। आएसएस से जुड़े संगठन जम्मू कश्मीर अध्ययन केंद्र ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।