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चोटी कटने की वजह छोटी पर ये कांड बड़े, बेकसूर बने निशाना

Fri, 04 Aug 2017 09:43 AM IST
amarujala.com- Presented by: विकास जांगड़ा
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कटी हुई चोटी - फोटो : अमर उजाला
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आगरा में एक महिला को चोटी काटने के शक में पीट-पीट कर मार डालने की घटना सामूहिक उन्माद का एक और रूप है। ठीक वैसा ही जैसा 2001 में ‘मंकी मैन’ और 2002 में ‘मुंहनोचवा’ के रूप में सामने आया था। ये घटनाएं साबित करती हैं कि तमाम आधुनिकता के बावजूद इनसान के मन में एक ऐसा आदिम डर बैठा है, जो गाहे-बगाहे सिर उठाता रहता है। 
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देश में ‘चोटी काटने वाले’, ‘मंकी मैन’ और ‘मुंहनोचवा’ से बहुत पहले से ‘बच्चा चोर’ होने के शक में भीड़ द्वारा बेकसूरों की जान लेने की घटनाएं होती रही हैं। यही नहीं, किसी इलाके में चोरी की घटनाएं ज्यादा होने लगे तो लोग किसी भी संदिग्ध को पीट-पीट कर मार डालते हैं। कहना न होगा कि हमें इस सामूहिक उन्माद की जड़ें तलाशनी होगी और इससे निपटने के उपाय भी करने होंगे।

सामाजिक-आर्थिक कारण भी होते हैं जिम्मेदार

सामूहिक उन्माद पैदा करने वाली घटनाएं प्राचीन समय से ही समाज का हिस्सा रही है लेकिन शिक्षा के प्रसार और बढ़ती जागरूकता से इसमें काफी कमी आई है। इसके बावजूद ऐसी घटनाएं होती रहती हैं। ऐसी घटनाओं के पीछे दो वजहें हो सकती हैं। ये दहशत फैलाने की किसी साजिश का हिस्सा हो सकती हैं।

आमतौर पर नशे के आदी और दूसरे असामाजिक तत्व चोरी की घटनाओं को अंजाम देने के लिए ऐसी अफवाहें फैलाते हैं। चिकित्सा विज्ञान के नजरिये से देखा जाए तो ‘आईडेंटिटी डिसऑर्डर’ के शिकार लोग इस तरह की अजीबोगरीब घटनाओं को शिकार पाए जाते हैं। ऐसे मरीज कुछ क्षणों के लिए खुद पर नियंत्रण खो देते हैं। उसके बाद वे क्या करते हैं या उनके साथ क्या होता है, इसकी उन्हें कोई खबर नहीं होती है।

चोटी काटने की घटनाओं में ही देखिए तो इसके शिकार कई लोगों ने बताया कि उनके सिर में तेज दर्द हुआ और फिर उनकी चोटी कटी हुई मिली। गौर से देखा जाए तो ऐसी घटनाएं आमतौर पर कमजोर सामाजिक और आर्थिक स्थिति के लोगों को ज्यादा प्रभावित करती हैं। जीवन की जद्दोजहद से परेशान ऐसे लोगों का मानसिक दबाव या तनाव में भ्रम का शिकार हो जाना हैरानी की बात नहीं है।
- डॉ. हर्षित गर्ग, मनोचिकित्सक, एम्स

शरारती तत्वों की करतूत पर लगाम लगे

मैं मानता हूं कि ऐसी घटनाओं को रोकने और आम जनता के डर को कम करने में पुलिस की अहम भूमिका है। उसे अफवाहों का खंडन करना चाहिए। इसके लिए तमाम संचार माध्यमों का इस्तेमाल करना चाहिए।

जनता को यह बताना चाहिए कि बाल काटने की घटनाएं या मंकी मैन और मुंहनोचवा के हमलों के पीछे कोई रहस्य नहीं है। यह असामाजिक तत्वों की शरारत है, जो दहशत फैलाकर अपना उल्लू सीधा करते हैं।  आज तक न तो मंकी मैन पकड़ा गया और न ही मुंहनोचवा। पुलिस को चाहिए कि वह ऐसे शरारती तत्वों के खिलाफ चौकसी बढ़ाए और उनके खिलाफ कार्रवाई करे।

सोशल मीडिया के युग में अफवाहें तेजी से फैल रही हैं। उस पर लगाम लगाने की जरूरत है। ऐसी घटनाओं के जिम्मेदार होने के शक में लोगों को मार डालने की घटनाएं सामूहिक उन्माद का नतीजा है। 
- -बिक्रम सिंह, पूर्व डीजीपी, उत्तर प्रदेश
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जब आया मंकी मैन और मुंहनोचवा

2001 के मई महीने में सबसे पहले मंकी मैन या काला बंदर के देखे जाने की घटनाएं सामने आईं। बंदर की तरह दिखने वाले 6-7 फीट लंबे प्राणी के पंजे लोहे के बताए गए। उसके पैरों में स्प्रिंग होती थी, जिनसे वह हमला कर पलक झपकते उछलकर गायब हो जाता था।

दिल्ली व नोएडा में इसके तथाकथित हमले में दो लोगों की मौत हो गई। पुलिस के अनुसार ज्यादातर मामलों में घायल लोग मंकी मैन की अफवाह के कारण फैली अफरा-तफरी के शिकार हुए थे।

मुंहनोचवा
वर्ष 2002 के जुलाई महीने में उत्तर प्रदेश के वाराणसी, इलाहाबाद, मिर्जापुर, चंदौली, गाजियाबाद जिलों से अजीबोगरीब प्राणी के हमलों ने आतंक मचाया था। चूंकि यह अपने पंजों से मुंह नोच लेता था इसलिए इसका नाम मुंहनोचवा पड़ा।

यह देखने में मंकी मैन की ही तरह लगता था, लेकिन कभी ऐसा कोई प्राणी पकड़ा नहीं गया। तत्कालीन राज्य सरकार ने आईआईटी कानपुर के वैज्ञानिकों से भी जांच करवाई थी, लेकिन कोई ठोस निष्कर्ष नहीं निकला।

इन घटनाओं में समान क्या है ?
- इस तरह की विचित्र घटनाएं आमतौर पर गर्मियों में होती है, जब बिजली की कटौती चरम पर होती है।
- इसके शिकार लोग आमतौर पर तंग और मलिन बस्तियों में रहने वाले गरीब और कम पढ़े-लिखे होते हैं।
- जितने प्रत्यक्षदर्शी होते हैं, उतने तरह के विवरण होते हैं, जिनमें से ज्यादातर अफवाहों पर आधारित होते हैं।
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