चंदन की लकड़ी और हाथी के दांतों की तस्करी लिए खुख्यात वीरप्पन के एनकाउंटर से जुड़ा एक बड़ा खुलासा हुआ है। फिल्मी ढंग में हुए इस एनकाउंटर में एसटीएफ की मदद एक बड़े बिजनेसमैन ने की थी। मीडिया खबरों के मुताबिक तत्कालीन एसटीएफ चीफ विजय कुमार ने अपनी किताब वीरप्पन: चेजिंग द बिग्रंड' में ये खुलासा किया है।
दरअसल, बिजनेसमैन के लिंक श्री लंका के तमिल लड़कों से थे और ऐसा माना जाता है वो उन्हें हथियार भी सप्लाई किया करता था। एसटीएफ के नाम उजागर करने के डर के बाद बिजनेसमैन मदद के लिए राजी हो गया।
पूरी कहानी में एसटीएफ का एक मुखबिर वीरप्पन के गैंग में जुड़ गया था। इसी मुखबिर को बिजनेसमैन के बारे में पता चला। क्योंकि बिजनेसमैन एक साफ छवि के लिए जाना जाता था इसलिए एसटीएफ को भी इसका यकीन नहीं हुआ।
वीरप्पन मोतियाबिन के इलाज के लिए मजबूर हो गया था
चीफ विजय कुमार एक बड़े मौके की तलाश में थे और वो उन्हें तब मिला जब वीरप्पन मोतियाबिन के इलाज के लिए मजबूर हो गया था। इसी का फायदा उठाकर विजय कुमार ने एक प्लान बनाया। टीम ने पहले बिजनेमैन को रंगे हाथों पकड़ना चाहा। वीरप्पन के निर्देश पर मुखबिर, बिजनेसमैन से मिलने के लिए गया।
मुखबिर जैसे ही मुलाकात करके कमरे से निकला तो एसटीएफ ने सारी बातचीत सुनकर उसे ब्लैकमेल करना शुरू कर दिया। जिसके बाद व्यापारी मदद के लिए राजी हो गया। एसटीएफ के प्लान के मुताबिक वीरप्पन मोतियाबिन के इलाज के बाद हथियारों के लिए श्री लंका आने के लिए मजबूर किया गया था।
हथियारों की डील श्री लंका में ही होगी
बिजनेसमैन ने वैसा ही किया उसने वीरप्पन के पास संदेश भेजा कि हथियारों की डील श्री लंका में ही होगी, लेकिन इससे पहले आंखों का ऑपरेशन किया जाएगा। बिजनेसमैन इस बात से चिंतित था कि आखिर वीरप्पन को लाने का काम कौन करेगा। इसके लिए एक सब-इंस्पेक्टर को चुना। वीरप्पन के एक आदमी ने एक टिकट के दो टुकड़े किए और एक बिजनेसमैन को थमा दी।
ये टिकट उस आदमी के लिए थी जो वीरप्पन को इलाज के लिए हॉस्पिटल लेकर जाएगा। इसके बाद वीरप्पन को एंबुलेंस में घेरकर खत्म कर दिया गया। बतां दे कि वीरप्पन का एनकाउंटर 18 अक्तूटर 2004 को किया गया था।