बंगलुरु में कथित तौर पर 150 रुपये की रिश्वत लेने के आरोप में घिरे एक प्रिसिंपल को कोर्ट ने बरी किया है। करीब 8 साल चले केस में 70 से ज्यादा सुनवाई हुईं। चौंका देने वाली बात है कि सुनवाई के लंबे दौर में इस केस पर सरकारी खजाने से 15 लाख रुपये की बड़ी नकदी खर्च हो गई।
दरअसल, स्कूल के प्रिसिंपल को छात्र से रिश्वत लेने के आरोप में रंगे हाथ पकड़ा गया था। लेकिन प्रिसिंपल ने अपनी सफाई में कहा कि उसने पैसे क्लास की जरूरत चॉक के लिए मांगे थे। बता दें कि सालों तक चले केस में कर्नाटक लोकायुक्त पुलिस और गवाहों की भूमिका काफी दिलचस्प है।
टीसी के बदले मांगे 150 रुपये
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एक रिपोर्ट के मुताबिक कर्नाटक लोकायुक्त पुलिस के पास करीब 1900 मामले पड़े हुए है, लेकिन वह इस मामूली केस को सालों तक घसीटती रही। बरी हुआ प्रिसिंपल आज भी दक्षिणी बेंगलुरु के हाई स्कूल में अपने पद पर नियुक्त हो रखे हैं। रिश्वत के इस मामले की सुनवाई दो महीने में एक बार होती थी और जिसका आकंड़ा 8 सालों में 72 पहुंच गया।
छात्र अनिल ने अपना स्कूल से नाम 2005 में कटवा दिया था। इसके बाद अनिल अपना ट्रांसफर सर्टिफिकेट लेने के लिए 2008 में स्कूल पहुंचा। प्रिसिंपल ने उसे टीसी देने के लिए 150 रुपये मांगे, लेकिन अपनी ये शिकायत लेकर पुलिस के पास पहुंच गया।
लोकायुक्त ने रिश्वत लेते पकड़ा रंगे हाथों
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इसके बाद आरोपों की झड़ी लग गई अपनी सफाई में प्रिसिंपल ने कहा कि उसने कोई रिश्वत नहीं मांगी, बल्कि अनिल को उसका टीसी टाइम पर दे दिया गया था। पुलिस ने फिल्मी अंदाज में प्रिसिंपल को रंगे हाथों पकड़ने के लिए प्लान बनाया। उन्होंने अनिल को पाउडर लगे हुए नोट थमा दिए और रिश्वत के तौर पर प्रिसिंपल को देने के लिए कहे।
अनिल, प्रिसिंपल के पास पहुंचा और उसने टीसी के बदले 150 दे दिए। इस बीच लोकायुक्त वहां पहुंचे और वहीं नोट बरामद किए जिसपर उन्होंने सफेद रंग का पाउडर डाला हुआ था। इस सफेद पाउडर को छुते ही प्रिसिंपल के हाथ गुलाबी हो गए। लेकिन, रंगे हाथों पकड़ने जाने के बावजूद प्रिसिंपल अपनी सफाई देने लगा।
उसने कहा कि ये पैसे अनिल से चॉक के लिए मांगे थे। इसके बाद कोर्ट में मामले की सुनवाई चलती रही, लेकिन कोई फैसला नहीं आया। आखिरकार गुरुवार को अनिल की ओर से यह साबित नहीं हो पाया कि प्रिसिंपल ने रिश्वत ली थी।