बिहार के चुनावी चौसर पर कई दिलचस्प समीकरण उभर रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक मुस्लिम बहुल सीटों पर शोर तो महागठबंधन का होता है, लेकिन इन विधानसभा क्षेत्रों में जीत एनडीए प्रत्याशियों को मिलती है। आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का साथ मिलते ही भाजपा लगभग अजेय हो जाती है। पढ़िए ये रिपोर्ट
बिहार के हर चुनाव में करीब 18% आबादी वाले मुसलमान समुदाय का शोर सबसे ज्यादा रहता है। इस बार यह शोर इस समुदाय के टिकटों और पद में उपेक्षा के कारण है। राजनीतिक विश्लेषक इस समुदाय को अरसे तक सत्ता की चाबी मानते रहे हैं। हालांकि, बीते कुछ चुनाव में मुस्लिम प्रभाव वाली सीटों के नतीजे बताते हैं कि इनमें भाजपा का पलड़ा भारी हो जाता है। खासतौर पर नीतीश का साथ मिलने के बाद राजग के लिए यही सीटें सत्ता की चाबी बन जाती हैं।
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राज्य में 51 सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिमों की हिस्सेदारी 20 से 67 फीसदी तक है। 35 सीटें ऐसी हैं, जहां इनकी हिस्सेदारी करीब 18 फीसदी है। बीते चुनाव में कांटे की टक्कर में इन्हीं सीटों ने एनडीए की सत्ता बचाई। इन 86 सीटों में एनडीए को 57 सीटों पर जीत हासिल हुई। इनमें 20% से अधिक आबादी वाली सीटों पर राजग का स्ट्राइक रेट 71% था। इससे एनडीए बहुमत का आंकड़ा छूने में कामयाब रही।
2010 के चुनाव में राजग की प्रचंड लहर में भी राजग को 86 में से 71 सीटों पर जीत हासिल हुई थी। तब 20% से अधिक मुस्लिम प्रभाव वाली 51 सीटों पर भाजपा को 27 तो जदयू को 13 सीटें हाथ लगी थी। जबकि 18 फीसदी से कम आबादी वाली 35 में से राजग ने 31 सीटें जीत ली थी। बीते चुनाव में भाजपा को 51 में से 23 तो जदयू को 10 सीटें हाथ लगी थी।
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समानांतर ध्रुवीकरण और मुस्लिम मतों में बिखराव
मुसलमानों के विपक्षी महागठबंधन के पक्ष में एकपक्षीय ध्रुवीकरण के जवाब में बहुसंख्यक आबादी के वोटों के समानांतर ध्रुवीकरण का लाभ मिलता रहा है। इसके अलावा, बीते चुनाव में एआईएमआईएम की एंट्री का भी सत्तारूढ़ एनडीए को लाभ मिला था। किशनगंज, कटिहार, पूर्णिया और अररिया में मुस्लिम आबादी 38 से 68% तक है। सीतामढ़ी, प. चंपारण, दरभंगा में 22% है। यहां मुस्लिम प्रभाव वाली सीटें 51, जबकि 18% आबादी वाले पूर्वी चंपारण, सुपौल, मधुबनी और सीवान में ऐसी 35 सीटें हैं।
ऐसी सीटों पर भाजपा तब और ताकतवर हो जाती है, जब उसे नीतीश का साथ मिलता है। 2015 में नीतीश ने भाजपा का साथ छोड़ा था, तब विपक्षी महागठबंधन को 51 में से 34 सीटें और 18% आबादी वाली 35 में से 24 सीटों पर जीत मिली थी। भाजपा इन सीटों में से 22 ही जीत सकी थी।
इस बार नए दावेदार:
राजग ने इस बिरादरी से किनारा कर लिया है। वहीं महागठबंधन, एआईएमआईएम के साथ जनसुराज पार्टी भी इस बार इस बिरादरी पर डोरे डाल रही है। एआईएमआईएम और जनसुराज ने ऐसी करीब-करीब सभी सीटों पर मुलसमान समुदाय को ही टिकट दिया है।