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कहां गए सावन के झूले? श्रावण में पार्वतीजी सखियों संग झूली थीं झूला, आज विकास की दौड़ में पीछे छूटी ये परंपरा

Wed, 05 Aug 2026 04:05 PM IST
दिनेश शर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर

सार

सावन का महीना हरियाली, बारिश, झूलों और धार्मिक आस्था का प्रतीक माना जाता है। शहरीकरण और आधुनिक जीवनशैली के कारण शहरों से सावन के झूले लगभग गायब हो गए हैं। हालांकि ग्रामीण क्षेत्रों और कुछ मंदिरों में यह परंपरा आज भी जीवित है, जिसे लोग उत्साह और श्रद्धा के साथ निभा रहे हैं।
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इंदौर में देवगुराड़िया के पास लगे झूलों पर झूलती युवतियां - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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सावन का महीना.. पवन करे शोर, रिमझिम गिरे सावन... जैसे फिल्मी गीतों ने सावन के महीने का महत्व बढ़ा रखा है। सावन का नाम सुनते ही हरियाली और बारिश की फुहारों का आनंद का अहसास हो जाता है। प्रकृति हरियाली की चादर से आच्छादित हो जाती है। कई प्राचीन कहावतों में भी सावन का अलग ही महत्व बताया है। 
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सावन के महीनो में आज भी झूले झूलने की परंपरा है। शहरों में विकास की दौड़ में झूले नहीं दिखाई देते, पर ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी झूले पेड़ों पर बंधे दिखाई देते हैं।

धार्मिक महत्व 
सावन के महीने में देवी पार्वती ने शिव जी के लिए कठोर तपस्या की थी। शिव जी ने पार्वती जी को स्वीकार किया था, तब पार्वती सखियों के साथ झूला झूला था। कृष्ण मंदिरों में सावन और भादव में झूलन उत्सव की परंपरा सदियों पुरानी रही है। मंदिरों में राधा-कृष्ण के सुंदर झूले सजाए जाते हैं। झूलों के उत्सव का हमारे धार्मिक ग्रंथों में भी महत्व है।  
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विकास में गुम हुए शहर के झूले 
आज भी शहर के कई लोगों को स्मरण है कि गांधी हॉल, नेहरू पार्क, पंचकुइया, छत्रीबाग साथ में कई मदिरों में पेड़ों पर सावन में झूले बांधे जाते थे। जिस पर विशेषकर महिलाएं झूले झूला करती थीं। अब स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के कारण नेहरू पार्क, गांधी हॉल, छत्रीबाग और पंचकुइया में विकास के नाम पर पेड़ कम होने से झूले नजर नहीं आते। 

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आधुनिक जीवन शैली के कारण भी अब नई पीढ़ी झूलों से दूर हो गई है। आज से दो दशक पूर्व तक सावन के मेले लगा करते थे, पर अब स्थान के अभाव में यह संभव नहीं रहा। झूले कुछ मंदिरो में या ग्रामीण क्षेत्रों में देखने को मिलते हैं।

देवगुराड़िया के गुटकेश्वर शिव मंदिर में झूला 
यहां पर दो पेड़ों पर झूले बांधे गए हैं, जहां झूलने वालों की लाइन लगी है। क्रम से युवक और युवतियां झूलों का आनंद ले रहे हैं। इंदौर से दर्शन के लिए गए सभी का कहना है कि सावन में झूलों का महत्व है, पर अब शहर में झूले कहां हैं इसलिए यह शौक यहीं पूरा कर लें और आनंद भी ले लें।
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बुजुर्गों का स्मरण 
अस्सी वर्षीय उमा देवी बताती हैं कि गांधी हॉल, बिस्को पार्क (अब नेहरू पार्क) में सावन में झूले बंधे रहते हैं, जहां झूलते थे। सावन के मेले भी लगते थे। आज के दौर में समय के साथ मनोरंजन के साधन भी बदले हैं, इसलिए महत्व भी कम हुआ है। संस्कृति और परंरराओं को जीवित रखा जाना आज के वक्त में एक चुनौती है।
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