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International Women's Day: दो सहेलियां, हजारों लोग मरे पर हौसला नहीं मरने दिया

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Thu, 08 Mar 2018 11:02 AM IST
वर्ष 1984 में 2-3 दिसंबर की दरमियानी रात... यूनियन कार्बाइड संयंत्र से निकली जहरीली गैस ने भोपाल में हजारों लोगों को मौत की नींद सुला दिया... मंजर ऐसा कि रूह कांप जाए... ऐसी त्रासदी के बावजूद दो महिलाएं रशीदा बी और चंपा देवी शुक्ला ने प्रभावित लोगों के हौसले को मरने नहीं दिया। जिंदगी में तमाम सवाल थे, चिंताएं थीं, लेकिनि उसमें उलझी नहीं। हिम्मत बनकर सामने आई और प्रभावित लोगों के हक और मुआवजे के हक के लिए जुट गईं। 

समाज के लिए उनके संघर्ष को देखते हुए 14 साल पहले वर्ष 2004 में दोनों सहेलियों को प्रतिष्ठित गोल्डमैन पर्यावरण अवॉर्ड दिया गया। अवॉर्ड से मिली रकम से वर्ष 2006 में 'चिंगारी' ट्रस्ट बनाया जो त्रासदी से पीड़ित महिलाओं व उनके परिवारों की माली हालत सुधारने के लिए कई कार्यक्रम चलाता है। त्रासदी प्रभावितों के संरक्षण व कॉरपोरेट अपराध व पर्यावरण विनाश के खिलाफ काम करने वाली महिलाओं को 'चिंगारी' अवॉर्ड देकर प्रोत्साहित करती हैं।

ट्रस्ट एक क्लीनिक भी संचालित करता है, जहां दिमागी व शारीरिक कमी के साथ जन्म लेने वाले बच्चों को मदद दी जाती है। सेंटर में बच्चों को फिजियोथेरेपी, ऑक्यूपेशनल थेरेपी, स्पीच थेरेपी, स्पेशल एजुकेशन देने के साथ खेल की गतिविधियां होती हैं। वह भी सब कुछ काबिल प्रोफेशनल्स की देखरेख में। 
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नहीं भूलती वो मौत की रात

रशीदा कहती हैं उस रात जब आंखें खोलीं तो जलन हो रही थी। फिर भागते लोगों का शोर सुना। घर के ज्यादातर सदस्य लापता थे। बाद में मुर्दाघर से सात लोगों की लाश मिली। कुछ समझ नहीं आ रहा था कि अब क्या किया जाए। इस मामले में चंपा देवी थोड़ी भाग्यशाली थीं। वे अपने परिवार के साथ भोपाल के बाहर चली गईं। जब लौटीं तो नंवबर 1985 में सरकार के स्टेशनरी सेंटर से जुड़ गईं। यहीं रशीदा से मुलाकात हुई और फिर संघर्ष का जो सफर शुरू हुआ, वह 33 साल से जारी है। दोनों सहेलियां बहुत कुछ खो चुकी हैं, पर 'चिंगारी' के जरिए गैस पीड़ितों की जिंदगी में रोजाना उजाला लाने की कोशिश करती हैं।

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