श्रीलंका के नए प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे 2006 में इंदौर आ चुके हैं। वे तीन दिन यहां रूके थे। उन्होंने आईआईएम में व्याख्यान दिया था। इंदौर में ही उन्होंने ये संभावना जताई थी कि आने वाले समय में नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बन सकते हैं।
आर्थिक संकट से जूझ रहे श्रीलंका में रानिल विक्रमसिंघे ने प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। वे श्रीलंका के 26वें प्रधानमंत्री बने। 9 मई को पूर्व प्रधानमंत्री महिंद्रा राजपक्षे के इस्तीफे के बाद विक्रमसिंघे ने 12 मई को शपथ ली थी। वे चार बार श्रीलंका के प्रधानमंत्री रह चुके हैं। यह उनका पांचवां कार्यकाल है। नए प्रधानमंत्री का मप्र के इंदौर से भी नाता रहा है। 16 साल पहले वे इंदौर आ चुके हैं और यहां व्याख्यान भी दे चुके हैं।
विज्ञापन
दरअसल, श्रीलंका के नवनियुक्त प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे 2006 में अपनी पत्नी के साथ इंदौर आए थे। तब वे तीन दिन इंदौर रूके थे। उन्होंने श्रीलंका और लिट्टे के बीच चल रहे संघर्ष और श्रीलंका में शांति स्थापना को लेकर आईआईएम इंदौर में व्याख्यान भी दिया था। श्री सत्यसाईं विद्या विहार के वार्षिकोत्सव में भी शामिल हुए थे, जहां शहरवासियों के साथ समय व्यतीत करने के साथ ही स्कूल के छात्रों को प्रोत्साहन किया था। इसी दौरान वे महेश्वर भी गए थे जहां प्रिंस रिचर्ड होलकर ने उनका स्वागत किया था।
शहर के उद्योगपति व शिक्षाविद डॉ. रमेश बाहेती से प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे की गहरी मित्रता रही है। अपनी मित्रता को याद करते हुए डॉ. बाहेती ने कहा कि रानिल जी, श्रीलंका के प्रधानमंत्री के रूप में नियुक्त होते थे तो मुझे सपरिवार कोलंबो उनके निजी अतिथि के रूप में आमंत्रित करते थे। 2006 में जब वे इंदौर आए थे तब मेरे ही निवास पर ठहरे थे। मुझसे व्यक्तिगत बातचीत में उन्होंने बहुत साल पहले ही कह दिया था कि यदि भारत में यूपीए सरकार जनता के बीच लोकप्रिय नहीं रही तो आने वाले समय में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही होंगे। मोदी तब गुजरात के मुख्यमंत्री थे। हम दोनों एक-दूसरे को पहले नाम से पुकारते हैं। मुझे पूरा विश्वास है कि उनके नेतृत्व में श्रीलंका अपनी चुनौतियों का डटकर सामना कर पाएगा। रानिल विक्रमसिंघे के नेतृत्व में भारत और श्रीलंका के रिश्तों में काफी मजबूती भी आई, लेकिन श्रीलंका के पूर्व प्रधानमंत्री के नेतृत्व में चीन से संबंध अधिक मजबूत हो गए। अब रानिल विक्रमसिंघे के आने से जनविद्रोह की संभावनाएं काफी कम हो गई हैं।