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World Photography Day: इंदौर ने भी फोटोग्राफी में बनाई अपनी अलग पहचान, नामचीन फोटोग्राफरों ने छोड़ी अमिट छाप

सार

फोटोग्राफी का इतिहास 1839 से शुरू होता है जब फ्रांस ने इसकी प्रक्रिया की घोषणा की। इसी वजह से हर साल 19 अगस्त को विश्व फोटोग्राफी दिवस मनाया जाता है। भारत में 1847 में ब्रिटिश फोटोग्राफर ने अजंता-एलोरा की गुफाओं के फोटो लिए। 
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इंदौर की फोटोग्राफी का इतिहास - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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आज मोबाइल से फोटो खींचना बहुत आसान है, लेकिन एक समय था जब तस्वीर लेना और उसका प्रिंट निकलवाना बेहद मुश्किल काम होता था। पहले बड़े-बड़े कैमरों से फोटो खींचे जाते थे और यह सुविधा केवल राजा-महाराजाओं तक ही सीमित थी।
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फोटोग्राफी का आविष्कार

विश्व में फोटोग्राफी का आविष्कार 1839 में हुआ। इसी वर्ष 19 अगस्त को फ्रांस ने फोटोग्राफी प्रक्रिया की घोषणा की थी। यही कारण है कि हर साल 19 अगस्त को विश्व फोटोग्राफी दिवस मनाया जाता है। 1840 में पहला ऐसा कैमरा बना जिससे स्थायी तस्वीरें ली जा सकती थीं।

अजंता-एलोरा की गुफाओं की पहली तस्वीरें

1847 में ब्रिटिश फोटोग्राफर विलियम आर्मस्ट्रांग ने अजंता-एलोरा की गुफाओं का फोटोशूट किया था। यह भारतीय फोटोग्राफी के शुरुआती दस्तावेजों में गिना जाता है। इंदौर में फोटोग्राफी का इतिहास 1888 से जुड़ा है। लाला दीनदयाल ने यहां पहला फोटो स्टूडियो शुरू किया। मेरठ के पास सरदाना में 1844 में जन्मे दीनदयाल ने रुड़की इंजीनियरिंग कॉलेज से पढ़ाई की थी। वे इंदौर में ड्राफ्ट्समैन की नौकरी करते हुए शौकिया तौर पर फोटोग्राफी सीखने लगे।
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महाराजा का सम्मान और 'राजा दीनदयाल' की उपाधि

दीनदयाल के काम से इंदौर के महाराजा और धार नरेश बेहद प्रभावित हुए और उन्हें जागीर में जमीन दी। 1888 में उन्होंने इंदौर, मुंबई और सिकंदराबाद में अपने स्टूडियो शुरू किए। बाद में वे निजाम के आग्रह पर हैदराबाद चले गए। निजाम ने उन्हें ‘राजा’ और ‘मसवीर-ए-जंग’ की उपाधि दी।



इंदौर में फोटोग्राफी की अगली कड़ी – मुकुंदराम मोंढे

लाला दीनदयाल के हैदराबाद चले जाने के बाद इंदौर में रामचंद्र राव प्रतापराव जाधव ने फोटोग्राफी का कार्य शुरू किया। इसके बाद 1923 में मुकुंदराम मोंढे ने स्टूडियो खोला, जो 1955 तक चला। उनके परिवार ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया। इंदौर में कई फोटोग्राफर और स्टूडियो अपनी कला और पहचान के लिए मशहूर हुए। इनमें रूपा स्टूडियो के आर.के. गुप्ता और मालवा स्टूडियो के शिवणेकर जैसे नाम प्रमुख रहे। इसी तरह वासुदेव राव, रमेश पेंडसे, शरद पंडित, सुबंधु दुबे, निहालचंद जैन और हंसराज जैन भी अपनी अलग शैली और काम के कारण प्रसिद्ध हुए। जाकिर अली मरहूम, ओ. पी. सोनी, भाटिया स्टूडियो और गोपाल फोटो स्टूडियो ने भी शहर की फोटोग्राफी दुनिया को समृद्ध बनाया। इंदौर की फोटोग्राफी यात्रा में पद्मश्री से सम्मानित प्रसिद्ध चित्रकार भालू मोंढे का विशेष योगदान रहा, जिन्होंने 1975 में पहली बार शहर में कलर फोटोग्राफी और कलर लैब की शुरुआत की।
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महू का 'गैरा एंड संस' स्टूडियो

महू का फोटोग्राफी इतिहास भी बेहद खास है। इतिहासकार डेंजिल लोबो के अनुसार, उनके परनाना क्रिस्टोफर गैरा 1895 में गोवा से महू आए और लाला दीनदयाल के स्टूडियो में काम करने लगे। 1912 में उन्होंने ‘गैरा एंड संस’ नाम से अपना स्टूडियो खोला। ब्रिटिश सेना की मौजूदगी की वजह से महू में फोटोग्राफी खूब फली-फूली। यहां बाद में ब्रिटिश नागरिक एच. हर्जोग और ऑस्ट्रिया के इंज्जिस ने भी अपना ‘हर्जोग एंड इंज्जिस’ स्टूडियो शुरू किया। 95 वर्षीय महू निवासी बंसीलाल हर्षवाल बताते हैं कि उन्होंने भी गैरा एंड संस में फोटो खिंचवाया था। उस दौर में महिलाएं फोटो खिंचवाने से परहेज करती थीं क्योंकि सामाजिक परंपराएं अलग थीं।
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