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Indore News: पीथमपुर में पहले भी जला है भोपाल गैस कांड का कचरा, इससे कोई नुकसान नहीं हुआः संभागायुक्त

Mon, 27 Jan 2025 07:55 PM IST
अर्जुन रिछारिया अमर उजाला, डिजिटल डेस्क, इंदौर

सार

Indore News: इंदौर में पत्रकारों से चर्चा के दौरान बोले संभागायुक्त दीपक सिंह, यूनियन कार्बाइड भोपाल के कचरे का पीथमपुर में निष्पादन करने से स्वास्थ्य और पर्यावरण पर नहीं पड़ेगा विपरीत प्रभात। 
 
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पत्रकारों से चर्चा करते संभागायुक्त। - फोटो : अमर उजाला, डिजिटल डेस्क, इंदौर
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विस्तार
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यूनियन कार्बाइड भोपाल के कचरे को पीथमपुर में निष्पादन करने से आमजन के स्वास्थ्य और पर्यावरण पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ेगा। दहन प्रक्रिया से उत्पन्न होने वाले अवशेषों को सिक्योर्ड लैण्डफिल में सुरक्षित तरीके से नष्ट किया जाएगा। इस अवशेष का एक भी कण भूजल में प्रवेश नहीं करेगा। कचरा जलाने की मानिटरिंग केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड तथा मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा की जाएगी। यह बात संभागायुक्त दीपक सिंह ने इंदौर में पत्रकारों से चर्चा के दौरान कही। 
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कचरा जलते वक्त में खुद वहां पर खड़ा रहूंगा
सिंह ने आगे कहा कि जिस दिन पीथमपुर में यूनियन कार्बाइड के कचरे को जलाया जाएगा, उस वक्त मैं स्वयं वहां पर मौजूद रहूंगा। यूनियन कार्बाइड भोपाल का यह कचरा वर्षों पुराना है और इसमें जो रासायनिक अवशेष हैं, उसमें मिथाइल आइसोसाइनाइड की उपस्थिति नहीं है। इस अवशेष में 5 प्रकार का कचरा है, जिसमें परिसर की मिट्टी, रिएक्टर अवशेष, सेविन (कीटनाशक) अवशेष, नेफ्थाल अवशेष और सेमीप्रोसेस्ड अवशेष शामिल हैं। इन अवशेषों का निष्पादन वैज्ञानिक तरीके से किया जाना अनिवार्य है। उक्त कचरे में कार्बनिक पदार्थ हैं। इसलिए उन्हें भस्मक में जलाना अनिवार्य है। इस कचरे को पीथमपुर में इसलिए जलाया जा रहा है, क्योंकि प्रत्येक राज्य में एक डिस्पोजल साइट है जहां पर इस तरह का कचरा जलाने की सुविधाएं हैं। मध्यप्रदेश में यह डिस्पोजल साइट (टीएसडीएफ) पीथमपुर में है और इस साइट पर यूनियन कार्बाइड भोपाल के कचरे को निष्पादन करने के निर्देश उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालय जबलपुर द्वारा दिए गए हैं। सिंह ने बताया कि पीथमपुर प्लांट में यूनियन कार्बाइड के कचरे को जलाने की आधुनिक सुविधाएं हैं और इसका प्रमाण केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा दिया गया है। जिसको उच्च न्यायालय जबलपुर और उच्चतम न्यायालय ने भी स्वीकार किया है। पीथमपुर प्लांट में कचरे को विभिन्न स्तर पर जलाया जाएगा। इसके बाद भी यदि कोई फ्लू गैस रह जाएगी, उसका भी उपचार करने की यहां व्यवस्था है। इस गैस के उपचार हेतु उपकरण स्प्रे डायर, मल्टी सायक्लान, ड्राय स्क्रबर, बैग फिल्टर, वेट स्क्रबर मौजूद है। फ्लू गैस से होने वाले उत्सर्जन के निरंतर मापन हेतु ऑनलाईन उत्सर्जन मॉनिटरिंग सिस्टम भी स्थापित है।

पहले भी जला चुके हैं वहां पर कचरा      
डॉ. सिंह ने बताया कि वर्ष 2015 में भी न्यायालय के निर्देश पर भोपाल यूनियन कार्बाइड के 10 टन कचरे को सैंपल के रूप में लाकर जलाया गया था। जिससे ये पता चल सके कि यह प्लांट कचरा जलाने के लिए उपयुक्त है। सिंह ने कहा कि पीथमपुर में निष्पादन करने से स्वास्थ्य और पर्यावरण पर किसी प्रकार का विपरीत प्रभाव नहीं पड़ना है, क्योंकि अब इस कचरे में मिथाइल आयसोसायनाईड गैस का कोई अस्तित्व नहीं है और इसमें किसी प्रकार के रेडियो एक्टिव कण भी नहीं है। जनता को विश्वास में लेकर ही कचरा जलाने की प्रक्रिया की जाएगी। सिंह ने कहा कि इससे न तो भूजल प्रदूषित होगा और न ही मिट्टी को नुकसान पहुंचेगा, क्योंकि यह निष्पादन सुरक्षित और वैज्ञानिक तरीके से किया जाएगा। इस कचरे का वैज्ञानिक तरीके से भस्मक करना अनिवार्य है, इसलिए इसका पीथमपुर डिस्पोजल साईट पर निष्पादन करना है। 
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जनसंवाद कार्यक्रम में यह जानकारी दे रहे अधिकारी...

1. यूनियन कार्बाइड का कचरा क्या है?
भोपाल गैस त्रासदी का कचरा पेस्टीसाईड का उत्पादन करने वाली यूनियन कॉर्बाइड फैक्ट्री के परिसर में रखा हुआ अवशेष है। इस कचरे में रासायनिक अवशेष हैं, जिसमें मुख्य रूप से 5 प्रकार के कचरे हैं:-
(1) परिसर की मिट्टी (2) रिएक्टर अवशेष (3) सेविन (कीटनाशक) अवशेष (4) नेफ्थाल अवशेष (5) सेमीप्रोसेस्ड अवशेष।
भोपाल गैस त्रासदी लगभग 40 वर्ष पहले 1984 में घटित हुई थी। वैज्ञानिक प्रमाण अनुसार सेविन और नेफ्थॉल दोनों रसायनों का प्रभाव अब लगभग नगण्य हो चुका है। महत्वपूर्ण तथ्य यह है की वर्तमान में इस कचरे में मिथाइल-आइसोसाईनेट गैस का कोई अस्तित्व नहीं है और इसमें किसी प्रकार के रेडियोएक्टिव कण भी नहीं है।

2. इस कचरे को जलाना क्यों आवश्यक है?
किसी भी प्रकार के पेस्टीसाईड उद्योग से उत्पन्न होने वाला कचरा 'परिसंकटमय एवं अन्य अपशिष्ठ (प्रबंधन एवं सीमापार संचलन) नियम 2016 के अनुसूची-1 के अनुसार खतरनाक श्रेणी में आता है। यूनियन कार्बाइड का कचरा भी इसी श्रेणी में आता है। इसलिए इस कचरे का निष्पादन उक्त नियम में दी गयी विधि तथा वैज्ञानिक तरीके से किया जाना अनिवार्य है। क्योंकि उक्त कचरे में कार्बोनिक पदार्थ हैं, इसलिए उन्हें भस्मक (incinerator) में जलाना आवश्यक है।

3. इस कचरे को पीथमपुर में ही क्यों जलाया जा रहा है?
भारत सरकार द्वारा बनाये गये नियम 'परिसंकटमय अपशिष्ठ (प्रबंधन एवं हथालन) नियम 1989' के अंतर्गत प्रत्येक राज्य को विभिन्न उद्योगों/संस्थानों से उत्पन्न होने वाले परिसंकटमय/ खतरनाक कचरे के निष्पादन (डिस्पोजल) हेतु एक ट्रीटमेंट स्टोरेज एंड डिस्पोजल फैसिलिटी (TSDF) का निर्माण करना होता है। मध्य प्रदेश में पीथमपुर में ही सबसे ज्यादा उद्योग होने के कारण और अपशिष्ठ की मात्रा भी अधिक होने की वजह से उक्त साईट का निर्माण पीथमपुर में किया गया है, जो Pithampur Industrial Waste Management Pvt. Ltd के नाम से संचालित है। यह भी ज्ञात होना जरूरी है कि राज्य में केवल एक ही डिस्पोजल साईट (TSDF) पीथमपुर में है और इसी कारण से अपशिष्ठ का निष्पादन पीथमपुर में किये जाने हेतु माननीय उच्चतम न्यायालय एवं माननीय उच्च न्यायालय जबलपुर द्वारा निर्देश दिए गए हैं।

4. पीथमपुर प्लांट में कचरे को जलाने के लिये किस प्रकार की सुविधाएं हैं?
प्लांट में अंतरराष्ट्रीय मानक का भस्मक और वैज्ञानिक पद्धति से निर्मित सिक्योर्ड लैंडफिल (Landfill) की व्यवस्था है। इसका प्रमाण केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) द्वारा किया गया है, जिसको माननीय उच्चतम न्यायालय एवं माननीय उच्च न्यायालय जबलपुर ने भी स्वीकार किया है। कचरे को वैज्ञानिक रूप से जलाने के लिए निम्नानुसार व्यवस्था है:
भस्मक में प्राथमिक दहन कक्ष, द्वितीय दहन कक्ष और गैसों के ट्रीटमेंट हेतु वायु प्रदूषण नियंत्रण व्यवस्थाएँ स्थापित हैं। कचरे को प्राथमिक दहन कक्ष में 850 डिग्री तापमान पर जलाया जायेगा, जिससे कचरे की राख नीचे चेंबर में एकत्रित होगी। फ्लू गैस आगे द्वितीयक दहन कक्ष में जायेगी, जहां का तापमान 1200 डिग्री रहता है, वहां गैस में जो भी बचे हुए पदार्थ होंगे वे पूर्णतः जल जायेंगे। इसके पश्चात आगे मात्र फ्लू गैस जायेगी, जिसके उपचार हेतु वायु प्रदूषण नियंत्रण अथवा गैस के उपचार हेतु सम्पूर्ण व्यवस्थाएं स्थापित हैं। गैस के उपचार हेतु उपकरण स्प्रे ड्रॉयर, मल्टी साँयकलॉन, डॉय स्क्रबर, बैग फिल्टर, वेट स्क्रबर मौजूद है। इन उपकरणों से उपचार पश्चात् फ्लू गैस 35 मीटर ऊंची चिमनी के माध्यम से उत्सर्जित होगी। चिमनी से उत्सर्जित होने वाली फ्लू गैस में गैस अथवा ठोस कण निर्धारित मानकसीमा के भीतर रहते हैं। फ्लू गैस से होने वाले उत्सर्जन के निरन्तर मापन हेतु ऑनलाईन उत्सर्जन मॉनिटरिंग सिस्टम भी स्थापित हैं, जो केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, म.प्र. प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पास उपलब्ध रहते हैं तथा प्लांट के मुख्य द्वार पर लगे डिस्प्ले बोर्ड पर प्रदर्शित होते हैं। इस प्रकार भस्मक में यूनियन कॉर्बाईड के अपशिष्ठ जलाने हेतु पर्याप्त सुविधा उपलब्ध है।

5. क्या 2015 में इस कचरे को सैंपल के रूप में जलाया गया था? उसके क्या परिणाम थे?
वर्ष 2015 में माननीय न्यायालय के निर्देश पर भोपाल गैस त्रासदी के 10 टन कचरे को पीथमपुर प्लांट में सैंपल के रूप में लाकर जलाया गया था। जिससे यह पता चल सके कि क्या यह प्लांट कचरे को जलाने के लिए उपयुक्त है और जलाने की प्रक्रिया में किस प्रकार की गैस / पदार्थ निकलेंगे? सैंपल कचरे की रिपोर्ट समाधानकारक होने के कारण ही न्यायालय ने पूरे कचरे को पीथमपुर प्लांट में जलाने का निर्देश दिया है।

6. कचरे को जलाने में कौन सी गैस अथवा पदार्थ निकलते हैं?
वर्ष 2015 में जलाये गए कचरे की वैज्ञानिक रिपोर्ट भारत के सर्वोच्च वैज्ञानिक संस्थान जैसे नीरी (NEERI), IICT, NGRI के मार्गदर्शन में बनायी गयी थी और इस रिपोर्ट को सर्वोच्च न्यायलय ने भी माना है। इसलिए इस रिपोर्ट पर आमजन पूर्ण रूप से विश्वास करें। इस रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष निम्नानुसार है:
कचरा जलाने पर चिमनी से उत्सर्जन होने वाले फ्लू गैस में ठोस कण, हाईड्रोजन क्लोराईड गैस, सल्फर डाई ऑक्साईड गैस, कार्बन मोनो ऑक्साईड गैस, कॉर्बन डाई ऑक्साईड गैस, हाईड्रोजन फ्लोराईड गैस, नाईट्रोजन के ऑक्साईड्स, डायक्सिन एवं फ्यूरॉन गैसेस का उत्सर्जन हुआ, किन्तु इन सभी की मात्रा निर्धारित मानक सीमा से काफी कम पाई गई। इसके अतिरिक्त कैडमियम, थैलियम, मर्करी, स्ट्रॉन्शियम, आर्सेनिक, जैसे पदार्थ का उत्सर्जन भी निर्धारित मानक सीमा से अत्यंत कम पाया गया। उक्त रिपोर्ट से यह समाधान होता है की जब पूरा कचरा जलाया जाएगा तब भी चिमनी से निकलने वाली सभी गैस / पदार्थ मानक सीमा से कम निकलेंगे और इनका पर्यावरण/स्वास्थ्य पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ेगा।

7. कचरा जलाने से पर्यावरण और आमजन के स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
वर्ष 2015 में किये गये ट्रॉयल रन के परिणामों के अनुसार चिमनी से होने वाले उत्सर्जन में समस्त प्रदूषक निर्धारित मानक सीमा से काफी कम मात्रा में पाये गये थे। कचरा जलने की प्रक्रिया में प्लांट से किसी भी प्रकार का जल/ तरल पदार्थ नहीं निकलेगा अर्थात कचरे निष्पादन की पूरी प्रक्रिया zero discharge पर आधारित है।  कचरा जलने से आमजन के स्वास्थ्य और पर्यावरण पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ेगा।

8. क्या अवशेष को सुरक्षित रूप से दफनाया जायेगा?
दहन प्रक्रिया से उत्पन्न होने वाले अवशेषों को सिक्योर्ड लैंडफिल (Landfill) में सुरक्षित तरीके से दफनाया जायेगा। इस अवशेष का एक कण भी भू जल में प्रवेश नहीं करेगा।

9. कचरा जलाने की मॉनिटरिंग किस प्रकार की जायेगी? आम जन से इस जानकारी को कैसे साझा किया जाएगा?
कचरा जलाने की मॉनिटरिंग केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, म.प्र. प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा की जायेगी। चिमनी से निकलने वाली फ्लू गैसेस की जांच हेतु ऑनलाईन सतत् उत्सर्जन मॉनिटरिंग सिस्टम स्थापित है, जिससे प्रदूषकों की जांच ऑनलाईन होगी। प्लांट के आस पास पूरे क्षेत्र में भी जल वायु की निरंतर मॉनिटरिंग की जाएगी। प्लांट परिसर के मुख्य गेट के पास डिस्प्ले बोर्ड स्थापित है, जिसमें अपशिष्ठों की मात्रा एवं दहन प्रक्रिया से उत्सर्जित होने वाली गैसों/पदार्थ की जानकारी प्रदर्शित होगी। प्लांट के मुख्य गेट पर लगे ऑनलाईन डिस्प्ले बोर्ड को आमजन भी देख सकेगे।

10. क्या कचरा जलाने का असर कई वर्षों बाद होना संभव है ? इसकी मॉनिटरिंग कैसे की जाएगी?
नहीं, कचरा जलाने का जलवायु और आमजन के स्वास्थ्य पर कई वर्षों बाद भी कोई असर नहीं पड़ेगा। इसके पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध हैं। इसको सुनिश्चित करने के लिए कचरा जलाने के बाद भी निरंतर रूप से जल वायु की गुणवत्ता जांच प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा की जाएगी। यह जानकरी आमजन से भी साझा की जाएगी।
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