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Devi Ahilya Birth Anniversary: पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व के कारण देवी अहिल्या ने महेश्वर को चुना राजधानी

सार

मध्य प्रदेश के मालवा में उज्जैन और महेश्वर की प्राचीन नगरों में गिनती होती है। प्राचीन ग्रंथो में अवंतिका (उज्जैन) और माहिष्मति (महेश्वर) का उल्लेख मिलता है। मान्यताओं के अनुसार राजा महिष्मान ने महेश्वर को बसाया था।
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देवी अहिल्या की 300वीं जन्म जयंती पर विशेष - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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महारानी देवी अहिल्या बाई होलकर 1735 में खंडेराव से विवाहित होकर इंदौर आ गई थीं, होलकर रियासत के प्रमुख मल्हारराव होलकर अहिल्या बाई के ससुर थे। अहिल्या बाई ने जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखे थे। इंदौर में आने के बाद 1754 में पति, 1766 में ससुर, पुत्र और सास का निधन हो गया था। इतने संकट एक नगर में रहकर झेलने के कारण अहिल्या बाई का इंदौर से मोहभंग हो गया था। 

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उन्होंने एकांत में जाकर रहने का विचार किया। मन की शांति के लिए अहिल्या बाई ने हिमालय के किसी स्थान पर जाकर रहने का भी विचार किया था, पर स्वभाव और कर्म से अत्यंत धार्मिक प्रवृत्ति की होने की वजह से अहिल्या बाई ने आसपास में ही किसी धार्मिक स्थान को ही अपनी राजधानी बनाने का विचार किया। इसमें महेश्वर उन्हें पौराणिक और ऐतिहासिक दृष्टि से सबसे श्रेष्ठ लगा, इसलिए उसे चुन लिया।

राजधानी के लिए इन स्थानों को देखा
देवी अहिल्या बाई नर्मदा नदी को अत्यधिक महत्व के साथ पवित्र मानती थीं। नर्मदा के किनारे के स्थानों पर राजधानी के लिए स्थान की खोज आरंभ हुई। प्राचीन ग्रंथों में वर्णित मर्दाना, जो निमाड़ में था, वह स्थान अहिल्या बाई को उचित लगा पर ज्योतिषों ने इस स्थान को उचित नहीं माना। महेश्वर को सभी मानकों पर उचित मानकर 1766 में राजधानी बनाने का निर्णय लिया गया था।

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महेश्वर का यह है महत्व
मध्य प्रदेश के मालवा में उज्जैन और महेश्वर की प्राचीन नगरों में गिनती होती है। प्राचीन ग्रंथो में अवंतिका (उज्जैन) और माहिष्मति (महेश्वर) का उल्लेख मिलता है। मान्यताओं के अनुसार राजा महिष्मान ने महेश्वर को बसाया था। राजा सहस्त्राजुर्न के अनुपदेश की राजधानी महेश्वर रही है। आदि शंकराचार्य और मंडन मिश्र का शास्त्रार्थ नर्मदा के किनारे इस क्षेत्र में हुआ था। हैहयवंशी राजाओं ने यहां राज किया, चालुक्यों के राज्य का यह प्रसिद्ध नगर था। मांडव के सुलतानों ने इस नगर पर विजय प्राप्त कर ली थी। 1422 में अहमदशाह ने हुशंगशाह से यह छीन लिया था। अकबर के कार्यकाल में महेश्वर का महत्व था।

ससुर मल्हारराव ने मुगलों से छिना था महेश्वर
1730 में श्रीमंत मल्हारराव होलकर ने महेश्वर को मुगलों से छीनकर अपने अधिकार में ले लिया था। 1745 में मल्हारराव होलकर ने महेश्वर में विशेष सुविधाएं देने के साथ भवनों के निर्माण का आदेश दिया था। महेश्वर को लेकर एक मान्यता यह भी है कि रावण सहस्त्रबाहु की राजधानी महेश्वर में आया था। उसने अपना पराक्रम दिखने के लिए उसने अपनी भुजाओं से नर्मदा का जल प्रवाह रोकने की कोशिश की थी, पर जल उसकी भुजाओं से निकल गया था, इसलिए महेश्वर में कुछ दूरी पर नर्मदा नदी का सहस्त्रधारा स्थान है। 

महेश्वर के विकास पर ध्यान दिया 
देवी अहिल्या बाई ने 1766 में महेश्वर को होलकर राज्य की राजधानी बना दिया था। राजधानी बनने से महेश्वर के विकास के द्वार खुल गए थे। राजधानी बनने के बाद महेश्वर का समुचित विकास हुआ। देवी अहिल्या बाई ने नर्मदा किनारे सुंदर घाट और कई मंदिरों का निर्माण और पुराने मंदिरों का जीर्णोद्धार करवाया था। मंदिर के निर्माण के लिए महेश्वर में देश भर से कई शिल्पियों, कारीगरों को महेश्वर में बसाया। स्थानीय लोगों को कार्य के लिए निमाड़ में कपास की अधिकता को देखते हुए महेश्वर में वस्त्र उद्योग आरंभ करवाया जो आज देश भर में महेश्वरी साड़ी के नाम से पहचाना जाता है।  

विद्वानों को महेश्वर में बसाया
पूना और महेश्वर का करीबी रिश्ता था, इसलिए महेश्वर राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण केंद्र था। राज्य में कई कानूनविद् आकर बस गए थे। कई धार्मिक विद्वानों को नगर में बसाया गया था। अहिल्या बाई ने संपूर्ण देश के विद्वानों को महेश्वर में नर्मदा तट पर संरक्षण दिया। इनमें प्रमुख मल्हार भट्ट मुल्ये, जानोबा पुराणिक, रामचंद्र रानाडे, काशीनाथ शास्त्री, दामोदर शास्त्री, निहिल भट्ट, भैया शास्त्री, मनोहर बर्वे, गणेश भट्ट, त्रियंबक भट्ट, महंत सुजान गिरि, गोस्वामी हरिदास, आनंद राम प्रमुख थे।  
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महेश्वर का रमणीय माहौल और छटा निराली
महेश्वर के सुंदर भवन, मंदिर और नर्मदा घाट वास्तुकला के सुंदर उदाहरण हैं। यहां का रमणीय माहौल और महेश्वर की छठा निराली है। अहिल्या बाई के कार्यकाल में निर्मित राजभवन, गादी और कई स्थल आज भी महेश्वर में मौजूद हैं, जो देवी अहिल्या बाई की गाथा को मानो सुना रहे हैं।
 
अहिल्या बाई के इंदौर प्रवास को लेकर मतभेद
देवी अहिल्या बाई विवाह के बाद कब इंदौर आईं थीं और यहां कितने वर्ष रही थीं तथा मल्हारराव होलकर किस स्थान से होलकर राजवंश की सत्ता का संचालन करते थे, इसे लेकर इतिहासकारों में मतभेद है। उन्होंने राजधानी इंदौर, भानपुरा, महेश्वर और पुनः इंदौर बनाई थी, इसलिए अहिल्या बाई कितने समय इंदौर रही यह स्पष्ट नहीं है। महेश्वर राजधानी बनाए जाने के बाद उनकी इंदौर के हालचाल जानने के लिए यहां की यात्रा का उल्लेख अवश्य मिलता है।
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