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Devi Ahilya Birth Anniversary: देवी अहिल्या के राजकाज के पत्र 'मोड़ी' में लिखे जाते थे, अब लुप्त हो रही लिपि

सार

रियासत काल में देश के अलग-अलग राजाओं के राजकाज के पत्रों की भाषा भी अलग-अलग होती थी। तब देवनागरी, संस्कृत, अरबी, फारसी लिपि में पत्र लिखे जाते थे। मराठा शासकों के राज में मराठी या मोड़ी लिपि में दस्तावेजों या पत्रों का लेखन होता था।
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देवी अहिल्या की 300वीं जन्म जयंती पर विशेष - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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किसी भी बात की प्रामाणिकता के लिए लिखित दस्तावेज का होना जरूरी रहता है। प्राचीन काल में संदेश भेजने ले लिए दूत, कबूतर आदि भेजे जाते थे। तीव्र गति से संदेश भेजने के लिए घुड़सवार दूत स्वयं संदेश लेकर जाया करते थे।  जाहिर है संदेशों और पत्रों का आदान प्रदान होता रहता था। जब ये संदेश भेजे जाते थे तो इन संदेशों की भाषा और लिपि हर रियासत की अपनी होती थी। देवी अहिल्या बाई या होलकर रियासत के समय में मराठी, मालवी, संस्कृत, हिंदी व अन्य भाषाओं में पत्राचार होता था, लेकिन उनकी लिपि मोड़ी हुआ करती थी। हालांकि, इस लिपि को लिखने व समझने वाले लोग अब देश में नगण्य हैं। एक तरह से यह लिपि लुप्त होती जा रही है। 

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रियासत काल में देश के अलग-अलग राजाओं के राजकाज के पत्रों की भाषा भी अलग-अलग होती थी। तब देवनागरी, संस्कृत, अरबी, फारसी लिपि में पत्र लिखे जाते थे। मराठा शासकों के राज में मराठी या मोड़ी लिपि में दस्तावेजों या पत्रों का लेखन होता था। अंग्रेजों के आगमन के बाद अंग्रेजी पत्रों और अन्य दस्तावेजों की भाषा रही। कुछ राजाओं के पत्र स्थानीय बोली में लिखे जाते थे।

मराठा साम्राज्य और पेशवाओं के भारत की राजनीति में उदय के बाद राजपूत शासकों से जो पत्रव्यवहार होता था इन पत्रों की भाषा हिंदी ही हुआ करती थी। उसका लेखन का स्वरूप कठिन हुआ करता था, तब हिंदी भाषा परिष्कृत नहीं होने के कारण स्थानीय आमजन की भाषा मालवी, राजस्थानी या खड़ी बोली में पत्र व्यव्हार किया जाता था।
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शिवाजी ने मराठी को बढ़ावा दिया
प्रसिद्ध इतिहासकर गोविंद सखाराम सरदेसाई के अनुसार शिवाजी महाराज के कार्यकाल में मराठी भाषा को प्रमुखता थी, उन्होंने फारसी के शब्दों के बजाय मराठी को महत्व दिया था।


(अहिल्या बाई के कार्यकाल का एक ताम्रपत्र सन 1770)

मंडलोई दफ्तर के दस्तावेज फारसी में 
मल्हारराव होलकर के कार्यकाल में प्रजा की भाषा मालवी या खड़ी बोली राज्य में प्रचलित थी। होलकर राज्य की स्थापना के पूर्व राजभाषा में फारसी का प्रचलन था। होलकरों के आगमन के पूर्व होलकर राज्य के पत्रों के दफ्तर को 'मंडलोई दफ्तर' के नाम से जाना जाता था इस दफ्तर में संग्रहित कागजात फारसी में हैं। सूबेदार मल्हारराव होल्कर के शासन काल में राजपूत राजाओं से होने वाला पत्र व्यवहार हिंदी में हुआ करता था। जोधपुर के महाराजा अभयसिंह को 17 नवंबर 1748 को जयपुर के महाराजा सवाई माधोसिंह को लिखे 21 अप्रैल 1750 के पत्रों की भाषा हिंदी है।  

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अहिल्या बाई के पत्रों की भाषा 
देवी अहिल्या बाई के प्राप्त प्रथम शिलालेख में मालवी और खड़ी बोली का प्रयोग है। इसमें संस्कृत, मराठी, फारसी और उर्दू के शब्द भी उपयोग हुए हैं। राज्य के अधिकतर कर्मचारी मराठी भाषी थे, जाहिर है राज्य में मराठी भाषा का प्रयोग  अधिक था। हालांकि, बाद में शिलालेखों, ताम्रपत्रों और सरकारी दफ्तरों में हिंदी भाषा में लिखने का प्रयोग हो चुका था। 
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मुक्ता बाई के निमंत्रण का पत्र हिंदी में था
देवी अहिल्या बाई की बेटी मुक्ता बाई के पुत्र नत्थू के विवाह के समारोह का निमंत्रण पत्र, जो राजपूत राजाओं को भिजवाया गया था उसकी भाषा हिंदी थी। उस दौर में हिंदी भाषा अपना कोई निश्चित रूप नहीं निर्मित कर पाई थी, इसलिए इस कालखंड में लिखे जाने वाले पत्रों में स्थानीय भाषा और बोलियों के शब्द प्रयोग होते थे, जैसे व्यवहार को बोहार, चिरंजीव को चिरंजी और प्रमाण को परमान जैसे शब्दों का प्रयोग होता था।

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हिंदी और मराठी घुली मिली थी 
देवी अहिल्या बाई के कार्यकाल में ब्राह्मण समाज के बच्चों के लिए संस्कृत शिक्षा का प्रावधान था। संस्कृत पाठशाला शास्त्री-पंडित अपने घरों में संचालित किया करते थे। होलकर शासन में मराठी भाषी हिंदी का प्रयोग सरलता से और हिंदी भाषी मराठी भाषा का उपयोग सरलता से कर लेते थे। इस तरह मालवा का असर जनसामान्य पर स्पष्ट झलकता था।

अब देवनागरी लिपि लोकप्रिय
मौजूदा देवनागरी लिपि भारत में उपयोग होने वाली एक लोकप्रिय लिपि है। यह प्राचीन ब्राह्मी लिपि से विकसित हुई है और इसका उपयोग 120 से अधिक भाषाओं को लिखने के लिए किया जाता है। यह आज देश की सर्वाधिक लोकप्रिय लिपि है।

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