रेल विभाग ने दिल्ली से मुबंई के रेलवे ट्रेक पर पटरियों की जांच शुरू की है। 70 हजार किलोमीटर लंबाई की पटरियों की ताकत के लिए उनकी सोनोग्राफी की जा रही है। पटरियों पर चलने वाली मशीन से हो रहे अल्ट्रासाउंड टेस्ट से ट्रेक पर जंग की स्थिति, उनकी वेल्डिंग की गुणवत्ता व उनके कमजर हिस्सों का पता लगाया जा रहा है। इस टेस्ट में एक अल्ट्रासोनिक मशीन का इस्तेमाल किया जा रहा है।
इंदौर के मुख्य रेलवे स्टेशन के एक नंबर और तीन नंबर प्लेटफार्म पर मशीन से पटरियां जांची की जा रही है। जब ट्रेक पर ट्रेन का आवागमन नहीं होता है, तब चार से पांच कर्मचारियों का दल यह काम करता है।
ट्रेक की जांच कर रहे अफसरों ने बताया कि ट्रेन हादसे लोको पायलेट की गलती, ट्रेक में टूट-फूट या ट्रेन के भारी वस्तु से टकराने से होती है। देश में कई रुटों पर बरसों पुरानी पटरियां है। उन पर आए क्रेक से हादसे न हो, इसलिए पटरियों की जांच होती है।
पटरियों की जांच के लिए इंट्रीग्रेटेड ट्रेक माॅनिटरिंग और ट्रेक रिकार्डिंग कार तकनीक का भी इस्तेमाल होता है, लेकिन अल्ट्रा साउंड टेस्ट वाली यह स्वदेशी तकनीक ज्यादा आधुनिक है।
आठ से दस लाख रुपये लागत की यह मशीन अासानी से एक दिन में 50 से 80 किलोमीटर ट्रेक की जांच आसानी से हो जाती है। मशीन को पटरियों पर रखकर चलाया जाता है। जिस हिस्से में भी ट्रेक की कमजोरी का पता चलता है। वहां से निकटवर्ती रेलवे स्टेशन की दूरी पताकर और निशान लगाकर जांच के लिए टीम आगे बढ़ जाती है।