सार
इंदौर के राजवाड़ा स्थित ऐतिहासिक महालक्ष्मी मंदिर में दीपावली पर 5 दिवसीय उत्सव मनाया जा रहा है। सन 1832 में मल्हारराव होलकर द्वितीय द्वारा स्थापित यह मंदिर 193 वर्षों से आस्था का केंद्र है, जहां 56 भोग और 3 विशेष श्रृंगार के साथ दर्शन होंगे।
राजबाड़ा के सामने दाईं ओर भारतीय स्टेट बैंक के पास देवी महालक्ष्मी का मंदिर शहरवासियों की आस्था का मुख्य केंद्र है। दीपावली से पहले ही मंदिर में दर्शन के लिए खासी भीड़ उमड़ रही है। महालक्ष्मी मंदिर में दीपावली के 5 दिनों में भक्तों की कतार लगी रहती है। दीपावाली के दिन विशेष श्रृंगार किया जाता है। दूर-दूर से लोग यहां दर्शन करने आते हैं। मंदिर में 56 भोग लगाया जाएगा और सुबह, दोपहर और शाम को अलग-अलग श्रृंगार में लोग महालक्ष्मी के दर्शन करेंगे।
अभी से मंदिर में भक्तों की खासी भीड़ है। शाम के समय कतारें और लंबी हो जाती हैं और मंदिर से गुरुद्वारा चौराहा तक भक्त खड़े रहकर दर्शन के लिए अपनी बारी का इंतजार करते हैं। पुलिस ने कतार के लिए अलग-अलग बेरिकेड लगा दिए हैं। कोई महालक्ष्मी के लिए साड़ी व सोलह श्रृंगार ला रहा है तो कोई कमल के फूल लेकर आ रहा है।
महालक्ष्मी के पूजन की परंपरा महाराष्ट्र में अधिक है। इंदौर को बसाने वाले होलकर राजा भी महाराष्ट्र के थे। उन्होंने शहर का भंडार धन-धान्य से भरपूर रहे, इसलिए राजवाड़ा के सम्मुख महालक्ष्मी मंदिर की स्थापना की गई थी। तब से आज तक यह मंदिर शहरवासियों का श्रद्धा केंद्र बना हुआ है। दीपावली पर मंदिर में फूल बंगला सजाया जाता है और लोग खूब चढ़ावा देते हैं। इस मंदिर का संचालन खासगी ट्रस्ट द्वारा किया जाता है।
193 साल पहले हुई थी मंदिर की स्थापना
193 वर्ष पूर्व 1832 में राजवाड़ा के सामने महालक्ष्मी मंदिर की स्थापना मल्हारराव होलकर द्वितीय (1811-1833) के कार्यकाल में हुई थी। 1818 में मंदसौर संधि के बाद इंदौर होलकर रियासत की राजधानी बना। राजधानी बनने के बाद नगर में रियासत के कार्यालय, राज्य के अधिकारियों की बैठकें राजवाड़ा में होने लगी थी, आरंभ के दिनों में महालक्ष्मी मंदिर एक पुराने मकान में था। राजधानी बनने के बाद नगर में कई भवनों के साथ मंदिर भी निर्मित किए गए थे, तभी यह मंदिर नया बनाया गया।
दीपावली पर होता है पांच दिनी उत्सव
राजवाड़ा के महालक्ष्मी मंदिर में कमल पर लक्ष्मीजी विराजित हैं, सुखसमृद्धि के गज (हाथी) स्थापित हैं। मंदिर में हनुमान जी, शिव, गणेश रिद्धि-सिद्धि सहित मां लक्ष्मी विराजित हैं। 1933 में हुए अग्निकांड में यह मंदिर जल गया था। लेकिन, माताजी की प्रतिमा सुरक्षित बचाकर अन्य स्थान पर सुरक्षित रखवा दी गई थी। दीपावली पर मंदिर में विशेष पूजन और अभिषेक होता है। पांच दिवसीय उत्सव में लक्ष्मीपूजा की संध्या यानी दिवाली को भक्तों की अधिक भीड़ रहती है। नवरात्र के दौरान भी भक्तगण महालक्ष्मी के दर्शन के लिए आते हैं। शुक्रवार को यहां सामान्य दिनों से अधिक भीड़ रहती है।