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Indore News: जापानी तकनीक का कमाल, इंदौर के कॉलेज ने दो साल में बना दिया जंगल

Sat, 14 Feb 2026 02:22 PM IST
अर्जुन रिछारिया न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर

सार

Indore News: इंदौर के एसजीएसआईटीएस संस्थान ने अपने परिसर में 1 एकड़ भूमि पर मियावाकी पद्धति से 'कृष्ण तरुवन' और 'चंदन निकुंज' नामक सघन वन विकसित किया है। 13 फरवरी 2026 को उद्घाटन किए गए इस वन में 8,175 पौधे लगाए गए हैं। 
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प्रोजेक्ट को देखने आए शहरवासी - फोटो : अमर उजाला, डिजिटल डेस्क, इंदौर
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विस्तार
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इंदौर के प्रतिष्ठित श्री जी.एस. प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान संस्थान (SGSITS) ने अपने परिसर में मियावाकी पद्धति का उपयोग कर एक सघन वन स्थापित किया है। यह पहल संस्थान की दीर्घकालिक हरित सोच और पर्यावरण के प्रति अटूट प्रतिबद्धता का परिणाम है, जिसकी शुरुआत लगभग दो वर्ष पूर्व की गई थी। इस परियोजना के माध्यम से संस्थान ने न केवल परिसर की हरियाली बढ़ाई है, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक स्वस्थ वातावरण की नींव भी रखी है।
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दूरदर्शी नेतृत्व और तकनीकी दक्षता का संगम
इस महत्वाकांक्षी परियोजना की परिकल्पना संस्थान के पूर्व निदेशक प्रो. (डॉ.) सक्सेना के कुशल नेतृत्व में की गई थी। उनका उद्देश्य शैक्षणिक उत्कृष्टता के साथ-साथ प्रकृति के संतुलन को बनाए रखना था। इस सोच को धरातल पर उतारने का महत्वपूर्ण कार्य एलेक्स कुट्टी और उनकी समर्पित टीम ने किया। टीम की तकनीकी दक्षता और निरंतर परिश्रम के कारण ही आज यह वन अपने पूर्ण स्वरूप में दिखाई दे रहा है।

कृष्ण तरुवन और चंदन निकुंज का औपचारिक उद्घाटन
बीते दो वर्षों की कड़ी मेहनत के बाद अब यह वन जनता और विद्यार्थियों के लिए तैयार है। वर्तमान निदेशक प्रो. नीतिश पुरोहित के मार्गदर्शन में 13 फरवरी 2026 को प्रातः 10:30 बजे एक भव्य समारोह आयोजित किया गया। इस दौरान परिसर में विकसित मियावाकी वन के दो प्रमुख खंडों “कृष्ण तरुवन” और “चंदन निकुंज” का औपचारिक उद्घाटन और जनसमर्पण किया गया।
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8,175 पौधे लगाए गए
संस्थान ने लगभग 1 एकड़ (43,000 वर्ग फुट) के विशाल क्षेत्र में इस वन को विकसित किया है। पौधारोपण अभियान की शुरुआत 14 फरवरी 2024 को हुई थी, जिसमें कुल 8,175 पौधे लगाए गए थे। रोपण के समय इन पौधों की औसत ऊंचाई मात्र 8-12 इंच थी, जो दो वर्षों के भीतर बढ़कर लगभग 15 फीट तक पहुंच गई है। इस परियोजना की सबसे बड़ी सफलता इसकी 90% जीवित रहने की दर और प्रति वर्ष 7 फीट की औसत वृद्धि दर है।

आधुनिक रख-रखाव और जैव विविधता है बेहद खास
वन को हरा-भरा रखने के लिए ड्रिप सिंचाई पद्धति का उपयोग किया जा रहा है, जिससे पानी की बचत के साथ पौधों को सटीक पोषण मिलता है। वहीं, खरपतवार हटाने के लिए रसायनों के बजाय मैन्युअल यानी हाथ से निराई की विधि अपनाई जाती है। इस वन में कुल 65 विभिन्न प्रजातियों के पौधे हैं, जिनमें से 25 प्रजातियां लुप्तप्राय या संकटग्रस्त श्रेणी की हैं, जो इसके पारिस्थितिक महत्व को और बढ़ाती हैं।

विद्यार्थियों में पर्यावरणीय संवेदनशीलता जगाएगा यह जंगल
समारोह के दौरान निदेशक प्रो. नीतिश पुरोहित ने इसे भविष्य की एक जीवंत धरोहर बताया जो विद्यार्थियों में पर्यावरणीय संवेदनशीलता जगाएगी। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि वरिष्ठ अधिवक्ता कृष्णराव चितले ने शहर के मध्य ऐसे सघन वन के निर्माण को संस्थान की संवेदनशील सोच का प्रतीक बताया। वहीं विशिष्ट अतिथि अधिवक्ता मुकेश कुमावत ने इसे सामाजिक उत्तरदायित्व का उत्कृष्ट उदाहरण कहा। कार्यक्रम में विभागाध्यक्षों, प्राध्यापकों और विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया, जिसमें चंदन सिंह और कृष्णराव चितले के परिवारों का भी विशेष सहयोग रहा।
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